Saturday, 22 April 2017

CONCEPT OG VIVAH SANSKARA( SPECIAL REFERENCE TO KAAMASUTRA)

भूमिका– सनातन धर्म में सद्गृहस्थ की, परिवार निर्माण की जिम्मेदारी उठाने के योग्य शारीरिक, मानसिक परिपक्वता आ जाने पर युवक-युवतियों का विवाह संस्कार कराया जाता है। भारतीय संस्कृति के अनुसार विवाह कोई शारीरिक या सामाजिक अनुबन्ध मात्र नहीं हैं, यहाँ दाम्पत्य को एक श्रेष्ठ आध्यात्मिक साधना का भी रूप दिया गया है। इसलिए कहा गया है 'धन्यो गृहस्थाश्रम:| सद्गृहस्थ ही समाज को अनुकूल व्यवस्था एवं विकास में सहायक होने के साथ श्रेष्ठ नई पीढ़ी बनाने का भी कार्य करते हैं। वहीं अपने संसाधनों से ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ एवं सन्यास आश्रमों के साधकों को वाञ्छित सहयोग देते रहते हैं। ऐसे सद्गृहस्थ बनाने के लिए विवाह को रूढ़ियों-कुरीतियों से मुक्त कराकर श्रेष्ठ संस्कार के रूप में पुनः प्रतिष्ठित करना आवश्क है। युग निर्माण के अन्तर्गत विवाह संस्कार के पारिवारिक एवं सामूहिक प्रयोग सफल और उपयोगी सिद्ध हुए हैं। विवाह दो आत्माओं का पवित्र बन्धन है। दो प्राणी अपने अलग-अलग अस्तित्वों को समाप्त कर एक सम्मिलित इकाई का निर्माण करते हैं। स्त्री और पुरुष दोनों में परमात्मा ने कुछ विशेषताएँ और कुछ अपूणर्ताएँ दे रखी हैं। विवाह सम्मिलन से एक-दूसरे की अपूर्णताओं की अपनी विशेषताओं से पूर्ण करते हैं, इससे समग्र व्यक्तित्व का निर्माण होता है। इसलिए विवाह को सामान्यतया मानव जीवन की एक आवश्यकता माना गया है। एक-दूसरे को अपनी योग्यताओं और भावनाओं का लाभ पहुँचाते हुए गाड़ी में लगे हुए दो पहियों की तरह प्रगति-पथ पर अग्रसर होते जाना विवाह का उद्देश्य है। वासना का दाम्पत्य-जीवन में अत्यन्त तुच्छ और गौण स्थान है, प्रधानतः दो आत्माओं के मिलने से उत्पन्न होने वाली उस महती शक्ति का निमार्ण करना है, जो दोनों के लौकिक एवं आध्यात्मिक जीवन के विकास में सहायक सिद्ध हो सके।
विवाह का स्वरूप आज विवाह वासना-प्रधान बनते चले जा रहे हैं। रंग, रूप एवं वेष-विन्यास के आकर्षण को पति-पत्नि के चुनाव में प्रधानता दी जाने लगी है, यह प्रवृत्ति बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है। यदि लोग इसी तरह सोचते रहे, तो दाम्पत्य-जीवन शरीर प्रधान रहने से एक प्रकार के वैध-व्यभिचार का ही रूप धारण कर लेगा। पाश्चात्य जैसी स्थिति भारत में भी आ जायेगी। शारीरिक आकषर्ण की न्यूनाधिकता का अवसर सामने आने पर विवाह जल्दी-जल्दी टूटते-बनते रहेंगे। अभी पत्नि का चुनाव शारीरिक आकषर्ण का ध्यान में रखकर किये जाने की प्रथा चली है, थोड़े ही दिनों में इसकी प्रतिक्रिया पति के चुनाव में भी सामने आयेगी। तब असुन्दर पतियों को कोई पत्नी पसन्द न करेगी और उन्हें दाम्पत्य सुख से वंचित ही रहना पड़ेगा। समय रहते इस बढ़ती हुई प्रवृत्ति को रोका जाना चाहिए और शारीरिक आकषर्ण की उपेक्षा कर सद्गुणों तथा सद्भावनाओं को ही विवाह का आधार पूवर्काल की तरह बने रहने देना चाहिए। शरीर का नहीं, आत्मा का सौन्दर्य देखा जाए और साथ में जो कमी है, उसे प्रेम, सहिष्णुता, आत्मीयता एवं विश्वास की छाया में जितना सम्भव हो सके, सुधारना चाहिए, जो सुधार न हो सके, उसे बिना असन्तोष लाये सहन करना चाहिए। इस रीति-नीति पर दाम्पत्य जीवन की सफलता निर्भर है। अतएव पति-पत्नी को एक-दूसरे से आकषर्ण लाभ मिलने की बात न सोचकर एक-दूसरे के प्रति आत्म-समपर्ण करने और सम्मिलित शक्ति उत्पन्न करने, उसके जीवन विकास की सम्भावनाएँ उत्पन्न करने की बात सोचनी चाहिए। चुनाव करते समय तक साथी को पसन्द करने न करने की छूट है। जो कुछ देखना, ढूँढ़ना, परखना हो, वह कार्य विवाह से पूर्व ही समाप्त कर लेना चाहिए। जब विवाह हो गया, तो फिर यह कहने की गुंजाइश नहीं रहती कि भूल हो गई, इसलिए साथी की उपेक्षा की जाए। जिस प्रकार के भी गुण-दोष युक्त साथी के साथ विवाह बन्धन में बँधें, उसे अपनी ओर से कर्त्तव्यपालन समझकर पूरा करना ही एक मात्र मार्ग रह जाता है। इसी के लिए विवाह संस्कार का आयोजन किया जाता है। समाज के सम्भ्रान्त व्यक्तियों की, गुरुजनों की, कुटुम्बी-सम्बन्धियों की, देवताओं की उपस्थिति इसीलिए इस धर्मानुष्ठान के अवसर पर आवश्यक मानी जाती है कि दोनों में से कोई इस कत्तर्व्य-बन्धन की उपेक्षा करे, तो उसे रोकें और प्रताड़ित करें। पति-पत्नी इन सन्भ्रान्त व्यक्तियों के सम्मुख अपने निश्चय की, प्रतिज्ञा-बन्धन की घोषणा करते हैं। यह प्रतिज्ञा समारोह ही विवाह संस्कार है। इस अवसर पर दोनों की ही यह भावनाएँ गहराई तक अपने मन में जमानी चाहिए कि वे पृथक् व्यक्तियों की सत्ता समाप्त कर एकीकरण की आत्मीयता में विकसित होते हैं। कोई किसी पर न तो हुकूमत जमायेगा और न अपने अधीन-वशवर्ती रखकर अपने लाभ या अहंकार की पूर्ति करना चाहेगा। वरन् वह करेगा, जिससे साथी को सुविधा मिलती हो। दोनों अपनी इच्छा आवश्कता को गौण और साथी की आवश्यकता को मुख्य मानकर सेवा और सहायता का भाव रखेंगे, उदारता एवं सहिष्णुता बरतेंगे, तभी गृहस्थी का रथ ठीक तरह आगे बढ़ेगा। इस तथ्य को दोनों भली प्रकार हृदयंगम कर लें और इसी रीति-नीति को आजीवन अपनाये रहने का व्रत धारण करें, इसी प्रयोजन के लिए यह पुण्य-संस्कार आयोजित किया जाता है। इस बात को दोनों भली प्रकार समझ लें और सच्चे मन से स्वीकार कर लें, तो ही विवाह-बन्धन में बँधें। विवाह संस्कार आरम्भ करने से पूर्व या विवाह वेदी पर बिठाकर दोनों को यह तथ्य भली प्रकार समझा दिया जाए और उनकी सहमति माँगी जाए। यदि दोनों इन आदर्शों को अपनाये रहने की हार्दिक सहमति-स्वीकृति दें, तो ही विवाह संस्कार आगे बढ़ाया जाए।
विवाह संस्कार में देव पूजन, यज्ञ आदि से सम्बन्धित सभी व्यवस्थाएँ पहले से बनाकर रखनी चाहिए। सामूहिक विवाह हो, तो प्रत्येक जोड़े के हिसाब से प्रत्येक वेदी पर आवश्यक सामग्री रहनी चाहिए, कर्मकाण्ड ठीक से होते चलें, इसके लिए प्रत्येक वेदी पर एक-एक जानकार व्यक्ति भी नियुक्त करना चाहिए। एक ही विवाह है, तो आचार्य स्वयं ही देख-रेख रख सकते हैं। सामान्य व्यवस्था के साथ जिन वस्तुओं की जरूरत विशेष कमर्काण्ड में पड़ती है, उन पर प्रारम्भ में दृष्टि डाल लेनी चाहिए। उसके सूत्र इस प्रकार हैं। वर सत्कार के लिए सामग्री के साथ एक थाली रहे, ताकि हाथ, पैर धोने की क्रिया में जल फैले नहीं। मधुपर्क पान के बाद हाथ धुलाकर उसे हटा दिया जाए। यज्ञोपवीत के लिए पीला रंगा हुआ यज्ञोपवीत एक जोड़ा रखा जाए। विवाह घोषणा के लिए वर-वधू पक्ष की पूरी जानकारी पहले से ही नोट कर ली जाए। वस्त्रोपहार तथा पुष्पोपहार के वस्त्र एवं मालाएँ तैयार रहें। कन्यादान में हाथ पीले करने की हल्दी, गुप्तदान के लिए गुँथा हुआ आटा (लगभग एक पाव) रखें। ग्रन्थिबन्धन के लिए हल्दी, पुष्प, अक्षत, दुर्वा और द्रव्य हों। शिलारोहण के लिए पत्थर की शिला या समतल पत्थर का एक टुकड़ा रखा जाए। हवन सामग्री के अतिरिक्त लाजा (धान की खीलें) रखनी चाहिए। ‍वर-वधू के पद प्रक्षालन के लिए परात या थाली रखे जाए। पहले से वातावरण ऐसा बनाना चाहिए कि संस्कार के समय वर और कन्या पक्ष के अधिक से अधिक परिजन, स्नेही उपस्थित रहें। सबके भाव संयोग से कमर्काण्ड के उद्देश्य में रचनात्मक सहयोग मिलता है। इसके लिए व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों ही ढंग से आग्रह किए जा सकते हैं। विवाह के पूर्व यज्ञोपवीत संस्कार हो चुकता है। अविवाहितों को एक यज्ञोपवीत तथा विवाहितों को जोड़ा पहनाने का नियम है। यदि यज्ञोपवीत न हुआ हो, तो नया यज्ञोपवीत और हो गया हो, तो एक के स्थान पर जोड़ा पहनाने का संस्कार विधिवत् किया जाना चाहिए। ‍अच्छा हो कि जिस शुभ दिन को विवाह-संस्कार होना है, उस दिन प्रातःकाल यज्ञोपवीत धारण का क्रम व्यवस्थित ढंग से करा दिया जाए। विवाह-संस्कार के लिए सजे हुए वर के वस्त्र आदि उतरवाकर यज्ञोपवीत पहनाना अटपटा-सा लगता है। इसलिए उसको पहले ही पूरा कर लिया जाए। यदि वह सम्भव न हो, तो स्वागत के बाद यज्ञोपवीत धारण करा दिया जाता है। उसे वस्त्रों पर ही पहना देना चाहिए, जो संस्कार के बाद अन्दर कर लिया जाता है। जहाँ पारिवारिक स्तर के परम्परागत विवाह आयोजनों में मुख्य संस्कार से पूर्व द्वारचार (द्वार पूजा) की रस्म होती है, वहाँ यदि हो-हल्ला के वातावरण को संस्कार के उपयुक्त बनाना सम्भव लगे, तो स्वागत तथा वस्त्र एवं पुष्पोपहार वाले प्रकरण उस समय भी पूरे कराये जा सकते हैं ‍विशेष आसन पर बिठाकर वर का सत्कार किया जाए। फिर कन्या को बुलाकर परस्पर वस्त्र और पुष्पोपहार सम्पन्न कराये जाएँ। परम्परागत ढंग से दिये जाने वाले अभिनन्दन-पत्र आदि भी उसी अवसर पर दिये जा सकते हैं। इसके कमर्काण्ड का संकेत आगे किया गया है। ‍
विवाह वेदी पर वर और कन्या दोनों को बुलाया जाए, प्रवेश के साथ मङ्गलाचरण 'भद्रं कणेर्भिः.......' मन्त्र बोलते हुए उन पर पुष्पाक्षत डाले जाएँ। कन्या दायीं ओर तथा वर बायीं ओर बैठे। कन्यादान करने वाले प्रतिनिधि कन्या के पिता, भाई जो भी हों, उन्हें पत्नी सहित कन्या की ओर बिठाया जाए। पत्नी दाहिने और पति बायीं ओर बैठें। सभी के सामने आचमनी, पंचपात्र आदि उपकरण हों। पवित्रीकरण, आचमन, शिखा-वन्दन, प्राणायाम, न्यास, पृथ्वी-पूजन आदि षट्कर्म सम्पन्न करा लिये जाएँ। वर-सत्कार- (अलग से द्वार पूजा में वर सत्कार कृत्य हो चुका हो, तो दुबारा करने की आवश्यकता नहीं है।) अतिथि रूप में आये हुए वर का सत्कार किया जाए। (१) आसन (२) पाद्य (३) अघ्यर् (४) आचमन (५) नैवेद्य आदि निधार्रित मन्त्रों से समपिर्त किए जाएँ।
दिशा और प्रेरणा वर का अतिथि के नाते सत्कार किया जाता है। गृहस्थाश्रम में गृहलक्ष्मी का महत्त्व सवोर्परि होता है। उसे लेने वर एवं उसके हितैषी परिजन कन्या के पिता के पास चल कर आते हैं। श्रेष्ठ उद्देश्य से सद्भावनापूर्वक आये अतिथियों का स्वागत करना कन्या पक्ष का कत्तर्व्य हो जाता है। दोनों पक्षों को अपने-अपने इन सद्भावों को जाग्रत् रखना चाहिए।  वर का अर्थ होता है- श्रेष्ठ, स्वीकार करने योग्य। कन्या-पक्ष वर को अपनी कन्या के अनुरूप श्रेष्ठ व्यक्ति मानकर ही सम्बन्ध स्वीकार करें, उसी भाव से श्रेष्ठ भाव रखते हुए सत्कार करें और भगवान से प्राथर्ना करें कि यह भाव सदा बनाये रखने में सहायता करें। वर पक्ष सम्मान पाकर निरर्थक अहं न बढ़ाएँ। जिन मानवीय गुणों के कारण श्रेष्ठ मानकर वर का सत्कार करने की व्यवस्था ऋषियों ने बनाई है, उन शालीनता, जिम्मेदारी, आत्मीयता, सहकारिता जैसे गुणों को इतना जीवन्त बनाकर रखें कि कन्या पक्ष की सहज श्रद्धा उसके प्रति उमड़ती ही रहे। ऐसा सम्भव हो, तो पारिवारिक सम्बन्धों में देवोपम स्नेह-मधुरता का संचार अवश्य होगा।  इन दिव्य भावों के लिए सबसे अधिक घातक है, संकीर्ण स्वाथर्परक लेन-देन का आग्रह। दहेज, चढ़ावा आदि के नाम पर यदि एक-दूसरे पर दबाव डाले जाते हैं, तो सद्भाव तो समाप्त हो ही जाती है, द्वेष और प्रतिशोध के दुर्भाव उभर आते हैं। वर-वधू के सुखद भविष्य को ध्यान में रखकर ऐसे अप्रिय प्रसंगों को विष मानकर उनसे सवर्था दूर रहना चाहिए। ध्यान रखें कि सत्कार में स्थूल उपचारों को नहीं हृदयगत भावों को प्रधान माना जाता है। उन्हीं के साथ निधार्रित क्रम पूरा किया-कराया जाए। क्रिया और भावना हाथ में अक्षत लेकर भावना करें कि वर की श्रेष्ठतम प्रवृत्तियों का अचर्न कर रहे हैं। देव-शक्तियाँ उन्हें बढ़ाने-बनाये रखने में सहयोग करें। निम्न मन्त्र बोलें-  ॐ साधु भवान् आस्ताम्। अचर्यिष्यामो भवन्तम्। [1]
वर दाहिने हाथ में अक्षत स्वीकार करते हुए भावना करें कि स्वागत की श्रद्धा पाते रहने के योग्य व्यक्तित्व बनाये रखने का उत्तरदायित्व स्वीकार कर रहे हैं। बोलें- 'ॐ अचर्य।' आसन- स्वागत आसन या उसका प्रतीक (कुश या पुष्प आदि) हाथ में लेकर निम्न मन्त्र बोलें। भावना करें कि वर को श्रेष्ठता का आधार-स्तर प्राप्त हो। हमारे स्नेह में उसका स्थान बने- ॐ विष्टरो, विष्टरो, विष्टरः प्रतिगृह्यताम्|[2]
वर कन्या के पिता के हाथ से विष्टर (कुश या पुष्प आदि) लेकर कहें- ॐ प्रतिगृह्णामि। उसे बिछाकर बैठ जाए, इस क्रिया के साथ निम्न मन्त्र बोला जाए- ॐ वष्मोर्ऽस्मि समानानामुद्यतामिव सूयर:। इमन्तमभितिष्ठामि, यो मा कश्चाभिदासति॥[3] पाद्य- स्वागतकत्तार् पैर धोने के लिए छोटे पात्र  में जल लें। भावना करें कि ऋषियों के आदर्शों के अनुरूप सद्गृहस्थ बनने की दिशा में बढ़ने वाले पैर पूजनीय हैं। । अर्घ्य- स्वागत चन्दन युक्त सुगन्धित जल पात्र में लेकर भावना करे कि सत्पुरुषार्थ में लगने का संस्कार वर के हाथों में जाग्रत् करने हेतु अर्घ्य दे रहे हैं। बुद्धि और अन्तःकरण तक यह भाव बिठाने का प्रयास कर रहे हैं। नैवेद्य- एक पात्र में दूध, दही, शकर्रा (मधु) और तुलसीदल डाल कर रखें। स्वागतकर्त्ता वह पात्र हाथ में लें। भावना करें कि वर की श्रेष्ठता बनाये रखने योग्य सात्विक, सुसंस्कारी और स्वास्थ्यवधर्क आहार उन्हें सतत प्राप्त होता रहे। वर मधुपर्क का पान करे। भावना करें कि अभक्ष्य के कुसंस्कारों से बचने, सत्पदार्थों से सुसंस्कार अजिर्त करते रहने का उत्तरदायित्व स्वीकार रहे हैं। तत्पश्चात् जल से वर हाथ-मुख धोए। स्वच्छ होकर अगले क्रम के लिए बैठे। इसके बाद चन्दन धारण कराएँ। यदि यज्ञोपवीत धारण पहले नहीं कराया गया है, तो यज्ञोपवीत प्रकरण के आधार पर संक्षेप में उसे सम्पन्न कराया जाए। इसके बाद क्रमशः कलशपूजन, नमस्कार, षोडशोपचार पूजन, स्वस्तिवाचन, रक्षाविधान आदि सामान्य क्रम करा लिए जाएँ। रक्षा-विधान के बाद संस्कार का विशेष प्रकरण चालू किया जाए।
विवाह घोषणा की एक छोटी-सी संस्कृत भाषा की शब्दावली है, जिसमें वर-कन्या के गोत्र पिता-पितामह आदि का उल्लेख और घोषणा है कि यह दोनों अब विवाह सम्बन्ध में आबद्ध होते हैं। इनका साहचर्य धर्म-संगत जन साधारण की जानकारी में घोषित किया हुआ माना जाए। बिना घोषणा के गुपचुप चलने वाले दाम्पत्य स्तर के प्रेम सम्बन्ध, नैतिक, धामिर्क एवं कानूनी दृष्टि से अवांछनीय माने गये हैं। जिनके बीच दाम्पत्य सम्बन्ध हो, उसकी घोषणा सवर्साधारण के समक्ष की जानी चाहिए। समाज की जानकारी से जो छिपाया जा रहा हो, वही व्यभिचार है। घोषणापूवर्क विवाह सम्बन्ध में आबद्ध होकर वर-कन्या धर्म परम्परा का पालन करते हैं।













                             संस्कार शब्द का अर्थ
संस्कार का सामान्य अर्थ है कि किसी वस्तु के रूप को परिवर्तित कर देना, उस वस्तु को नूतन रूप दे देना| वैदिक संस्कृति में मानव–जीवन के लिए सोलह संस्कारों का नियम है| इसका तात्पर्य यह है कि जीवन में सोलह बार मनुष्य को बदलने का, उसके नये निर्माण का प्रयास किया जाता है| जैसे सुनार अशुद्ध सोने को अग्नि में डालकर उसका संस्कार करता है, ठीक उसी प्रकार बालक के उत्पन्न होते ही उसे संस्कारों की भट्टी में डालकर उसके दुर्गुणों को निकालकर उसमें सद्गुण प्रवेश कराने के प्रयास को वैदिक ऋषियों ने संस्कार नाम दिया है| चरक ऋषि ने कहा है कि– ‘संस्कारो हि गुणान्तराधानमुच्यते’ अर्थात् संस्कार पूर्व के दुर्गुणों को हटाकर उसके स्थान पर अच्छे गुणों को स्थापित कर देने को कहते है|
‘संस्कार’ शब्द ‘सम्’ उपसर्ग पूर्वक ‘कृ’ धातु में ‘घज्’ प्रत्यय को जोड़कर बनता है| ‘संस्कार’ का अर्थ शुचिता, पवित्रतता और परिष्कार से है| आचार्य शबर संस्कार के विषय में कहते है कि– ‘संस्कार वह है जिसके होने से कोई पदार्थ या व्यक्ति किसी कार्य के लिए योग्य हो जाता है’–
                 संस्कारो नाम स भवति यस्मिन्जाते पदार्थो योग्य: कस्यचिदर्थस्य|[4]
संस्कार वे क्रियायें एवं रीतियाँ है, जो किसी भी कार्य को करने की योग्यता प्रदान करता है–
                 योग्यता चादधाना: क्रिया: संस्कारा इत्युच्यन्ते|
अत: संस्कार मनुष्य के शारीरिक, सामाजिक, बौद्धिक और धार्मिक शुद्धिकरण के उद्देश्य से वह धार्मिक क्रिया है, जो पवित्रतता अनुष्ठान प्रक्रिया में आस्था रखती है| संस्कार मनुष्य के पूर्ण सकारात्मक तरीके के द्वारा नये निर्माण की आधारशीला है| मनुष्य अपने जन्म के समय दो प्रकार के संस्कार लेकर आता है, प्रथम तो वह जन्म-जन्मान्तर का संस्कार, और द्वितीय अपने माता–पिता  के संस्कार, जो कि वंश–परम्परा से ग्रहण करता है| संस्कार अच्छे भी हो सकते है और बुरे भी| संस्कारों के द्वारा बालक को ऐसे वातावरण में रखा जाता है, जिसमें सुन्दर संस्कारों को पनपने का अवसर उपलब्ध हुआ हो, बुरे संस्कार चाहे पूर्व जन्म के हो या माता–पिता से प्राप्त हुए हो और चाहे इस जन्म में पड़ने वाले हो, वैसे संस्कारों को निर्बीज कर दिया जाये| आधुनिक योजनायें  भौतिक है और संस्कारों की योजनायें आध्यात्मिक है| संस्कार सूक्ष्म शरीर में रहते है|
प्राचीनकाल से ही भारतीय सामाजिक जीवन शैली में संस्कारों के महत्त्व को प्रतिपादित किया गया है| संस्कारों के माध्यम से मानव का वैयक्तिक एवं सामुदायिक विकास होता और मानव का दैहिक और भौतिक जीवन सुचारू रूप से उन्नतशील हो, इसलिए संस्कारों को मानव जीवन में ऋषियों ने स्थापित किया| ‘संस्कार’ का आधार ‘धर्म’ है, जिसके द्वारा मानव अपने जीवन को आनन्दित, उन्नतशील, परिष्कृत, और सुसंस्कृत बनाता है|
संस्कारों के बारे में डॉ. जयशंकर मिश्र कहते है कि– “संस्कारों का विधान अलौकिक पृष्ठ भूमि में व्यक्त किया गया है तथा इसकी उत्पत्ति में मानवीय प्रवृत्तियों का विशेष हाथ है| यह आख्यानों में निहित प्रवृत्ति से भी स्पष्ट है| ऐसी स्थिति में ‘संस्कार’ सामाजिक एवं धार्मिक अवधारणा है| सभी संस्कृतियों में संस्कारों का होना अनिवार्य है, जो उनकी सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था तथा कार्यप्रणाली को व्यक्त करते है| इस प्रकार भारतीय समाज और संस्कृति में संस्कारों का अभूतपूर्व योगदान है (प्रा. भा. का सा. इति.)|
जन्म से लेकर मृत्यु तक मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन संस्कारों के माध्यम से शुद्ध होता रहता है| मानव यदि संस्कारों से रहित है तो वह अपवित्र माना जाता है| संस्कारों की संख्या पर धर्मशास्त्रकारों में मतभेद है| गौतम चालीस संस्कार मानते है– चत्वारिंशत्संस्करा:|[5] परन्तु बहुत से विद्वानों ने प्रमुख रूप से सोलह संस्कार स्वीकार किये है– गर्भाधान, पुंसवन, सिमन्तोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म, कर्णवेध विद्यारम्भ, केशांत, समावर्तन, विवाह और अंत्येष्टि| वात्स्यायन ने केवल विवाह संस्कार का ही उल्लेख कामसूत्र में किया है| विद्यारम्भ, वेदारम्भ, समावर्तन आदि का केवल संकेत करते है-
बाल्ये    विद्याग्रहणादीनर्थान्|[6]
ब्रह्मचर्यमेव त्वा विद्याग्रहणात्|[7]
वात्स्यायन का कहना है की अच्छे नागरक की आधारशिला बचपन में ही हो जाना चाहिए| इसीलिए बाल्यकाल में ही विद्यारम्भ संस्कार होना चाहिए| उसके बाद उपनयन, वेदारम्भ आदि संस्कारों से व्रतबंध होकर ब्रह्मचर्य पूर्वक सभी प्रकार की विद्याओं का ज्ञान होना चाहिए| इसके बाद समावर्तन के माध्यम से गृहस्थाश्रम में प्रवेश करना चाहिए–
गृहीतविद्य: प्रतिग्रहजयक्रयनिर्वेशाधिगतैरर्थैरन्वयागतैरुभयैर्वा ग्राहस्थ्यमधिगम्य नागरकवृत्तं वर्तते|[8]
यहाँ पर वात्स्यायन समावर्तन संस्कार के बारे में वर्णन करते है कि जब ब्रह्मचर्य पूर्वक विद्या प्राप्त कर लिया जाए, तब स्नातक समावर्तन संस्कार के बाद अपने गृह जाकर अर्थोपार्जन के माध्यम से नागरक जीवन व्यतीत करें|



                              विवाह संस्कार
भारतीय संस्कृति में ‘विवाह’ संस्कार को बहुत ही अधिक महत्त्व दिया जाता है| क्योंकि विवाह जीवन का एक प्रमुख भाग है और धर्मार्थ के लिए उपयोगी है| पुरुष और स्त्री का सयोग अनादि है| इस अनादि संयोग को जब वैधिक मान्यता प्राप्त हो जाती है तब वह विवाह कहा जाता है| वैदिक युग से लेकर आधुनिक युग तक यह परंपरा निरंतर चली आ रही है| विवाह का उद्देश्य वासना की तृप्ति करना नहीं है अपितु आचरण और चरित्र का सामाजिक रूप से विकास करना है| विवाह आध्यात्मिकता का भी मूल है| भारतीय संस्कृति में वैवाहिक जीवन के लिए उत्तम आदर्श शिव और पार्वती का ‘अर्धनारीश्वर’ रूप माना जाता है|
समाज का संयोजन पूर्ण रूप से विवाह के माध्यम से ही होता है| नर और नारी पूर्णता को तभी प्राप्त करते है जब वे दोनों एक हो जाते है-
अर्थो ह वा एष आत्मनो यज्जाया तस्माद्यावज्जाया न विन्दते नैव तावत्प्रजायते असर्वो हि तावाद् भवति|[9]
वात्स्यायन ने कहा है कि ‘ज्ञान प्राप्ति के पश्चात अपने वर्ण के अनुसार अर्थ ग्रहण करते हुए उत्तम विधि से विवाह करके गृहस्थाश्रम का पालन करना चाहिए’|[10]
विवाह संस्कार से कामसुख की प्राप्ति होती है, और साथ में ही पुत्री एवं पुत्र की प्राप्ति भी होती है जो की उसके यश में वृद्धि करता है तथा उसके लौकिक धर्म का पालन भी करता है-
कामश्चतुर्षु वर्णेषु सवर्णेत: शास्त्रतश्चानन्यपुर्वायां प्रयुज्यमान: पुत्रीयो यशस्यो लौकिकसश्च भवति|[11]
वात्स्यायन कहते है कि अपने वर्ण की किसी अक्षतयोनि कन्या से विधि पूर्वक विवाह करना चाहिए, जिससे की धर्म, अर्थ, वंशवृद्धि, सम्भोग वृद्धि आदि की प्राप्ति आनंद पूर्वक हो–
सवर्णायामनन्य पूर्वायां शास्त्रतोsधिगतायां धर्मोsर्थ: पुत्रा: सम्बन्ध: पक्षवृद्धिरनुपस्कृता रतिश्च|[12]
अत: इस प्रकार से वात्स्यायन विवाह के द्वारा मानव धर्म का पालन, अर्थ-प्राप्ति, वंशवृद्धिकारक पुत्री-प्राप्ति, सम्भोगसुख-प्राप्ति और लौकिक एवं पारलौकिक दायित्वों की पूर्ति करते हुए प्रेम की प्राप्ति करता है क्योंकि विवाह का प्रमुख उद्देश्य अनुराग, रति और प्रेम है–
                                     व्यूढानां हि विवाहानामनुराग: फलं|[13]
स्त्री और पुरुष के परस्पर उत्तम अनुराग के द्वारा ही विवाह संस्कार पूर्ण रूप से सिद्ध होता है| जिसके द्वारा सभी मनोकामनायें पूर्णता को प्राप्त होती है क्योंकि आपस में प्रेम न होने से पति-पत्नि का जीवन दुःखमय हो जाता है| घर में कलह होने लगता है| अत: विवाह संस्कार प्रेम और अनुराग के साथ उतं विधि से ही करनी चाहिये|


                        













                          विवाह-निर्धारण
विवाह निर्धारित करने के लिए प्रथमतया वर और वधु पक्ष के वंश को निर्धारित करना होता है| दोनों पक्षों के लोग अपने योग्यता के अनुसार एक-दुसरे को अपनाते है| जब पूर्ण रूप से विश्वास हो जाता है, तब विवाह की तिथि निर्धारित की जाती है| विवाह निर्धारण के विषय में वात्स्यायन का मत है की– ‘विवाह के निर्धारण हेतु वर और कन्या पक्ष के लोगों को चाहिए कि वे वर और कन्या के भाग्य, ग्रह-नक्षत्र आदि की अनुकूलता को देखते हुए अशुभ योगों को बचाकर निमित्त एवं शकुन आदि पूछकर शुभ समय में विवाह करें-
                     दैवनिमित्तशकुनोपश्रुतीनामानुलोम्येन कन्यां वर्येद्दद्याच्च |[14]
आगे घोटकमुख का उदाहरण देते हुए कहते है कि- ‘वर एवं कन्या के माता-पिता का कर्तव्य होता है कि वे केवल स्वेच्छा से ही विवाह सम्बन्ध का निश्चय न करें अपितु विवाह सम्बन्ध तय करते समय वर और कन्या से भी सहमति प्राप्त करे, उसके पश्चात कुटुम्बियों, सम्बन्धियों, और हितैषियों का भी मत स्वीकार करें-
                     न यदृच्छया: केवलामानुषायेती घोटकमुख|[15]
विवाह सम्बन्ध को पुष्ट करने के लिए, कन्या को देखने के लिए वर पक्ष के लोगों को आमंत्रित करें| जब वे लोग कन्या दर्शन हेतु आवें तो कन्या पक्ष के लोग उनका मांगलिक वस्तुओं के द्वारा स्वागत करें–
          वरणार्थमुपगतांश्च भद्रदर्शनान् प्रदक्षिणवाचश्च तत्सम्बंधिसंगतान् पुरुषान्मंगलै: प्रतिगृह्णीयु:|[16]
वर पक्ष जिस कन्या को देखने आयें, उसे वस्त्राभूषण से सुशोभित करके उन्हें दिखायें –
                        कन्यां चैषामलंकृतामन्यापदेशेन दर्शयेयु:|[17]
इसके बाद विवाह की शुभ तिथि निर्धारित करें| कन्या का दैव परिक्षण भी करना चाहिए| अग्नि को साक्षी मानकर विवाह को संपन्न करायें| अत: अंत में यही कहा जा सकता है कि विवाह का निर्धारण वर और कन्या को ध्यान में रखकर किया जायें| जिसके माध्यम से उनका दाम्पत्य जीवन प्रेम पूर्वक, अनुराग और आनंदमय व्यतीत हो| 

                    
                     विवाह के प्रकार
वात्स्यायन ने धर्मशास्त्रीय आधार को लेते हुए विवाह के आठ प्रकार बताए है- ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, आसुर, गान्धर्व, राक्षस और पैशाच| राक्षस विवाह सभी वर्णों के लिए निष्कृष्ट स्वीकार किया गया है| मनु ने भी विवाह के आठ प्रकार ही माने है और विष्णु पुराण में भी आठ ही विवाह स्वीकार किये गये है| लगभग सभी धर्मशास्त्रियों ने विवाह के यहीं आठ प्रकार स्वीकार किये है-
ब्राह्मो दैवस्तथैवार्ष: प्राजापत्यस्तथाssसुर:| गान्धर्वो राक्षसश्च पैशाचश्चाष्टमोsधम:||[18]
ब्राह्मो  दैवस्तथैवार्ष:  प्राजापत्यस्तथासुर:| गान्धर्वराक्षसो चान्यो  पैशाचाष्टमोमत:||[19]
इसी प्रकार से चाणक्य, आपस्तम्ब, गौतम आदि सभी ने विवाह के आठ प्रकार स्वीकार किये है| ‘वात्स्यायन ने विवाह के आठ प्रकारों में ब्राह्म, प्रजापत्य, आर्ष, और दैव का केवल उल्लेख किया है’[20]| परन्तु आसुर, गान्धर्व, राक्षस और पैशाच, इन सबका वर्णन विधि पूर्वक करते है| 
ब्राह्म-विवाह: यह विवाह सभी विवाहों से श्रेष्ठ है| वर के कुल, आचरण, धर्म में आस्था, विद्या, स्वास्थ्य आदि के विषय में जानकारी प्राप्त करके, स्वशक्त्यानुसार कन्या को आभूषणों से सुशोभित करके संतानोंत्पत्ति और एक साथ धर्माचरण के उद्देश्य से कन्या को जब विवाहित किया जाता है, वह ब्राह्म विवाह कहलाता है-
ब्राह्मेविवाहे बंधुशीललक्षणसंपन्नस्त्रुतारोग्याणी बुध्वा प्रजां सहत्वकर्मभ्य: प्रतिपादयेच्छवितविषयेणाsलंकृत्य|[21]
चाणक्य भी आपस्तम्ब के मत को स्वीकार करते है- कन्यादानं कन्यामलंकृत्य ब्राह्मोविवाह:|[22]
अर्थात ‘कन्या को वस्त्राभूषण से सुशोभित करके कन्या को दान करने को ब्राह्मविवाह कहते है’| आज भी हिन्दुओं में यहीं विधि सबसे ज्यादा प्रसिद्ध है| शंकर-पार्वती और वशिष्ठ–अरुंधती के विवाह इसके उदाहरण है| धर्मोचित विवाह गृहस्थ जीवन की सुख-समृद्धि का कारण होता है और अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है|
दैव-विवाह: इस विवाह में पिता यज्ञ-काल में वर—योग्य ऋत्विज को प्राप्त कर उसे अपनी कन्या प्रदान करता है, इसलिए यह दैव विवाह कहलाता है- अन्तर्वेद्यामृत्विजे  दानाद्दैव:|[23]
दैव-विवाह में केवल ब्राहमण पुरोहित ही वधू प्राप्त कर सकता था, अन्य व्यक्ति नहीं प्राप्तकर सकता है| यज्ञ के समय यजमान प्रसन्न होकर अपनी कन्या यज्ञ करने वाले को सत्कार पूर्वक दान करता है| मनु के अनुसार–
                 यज्ञे तु वितते सम्यग्गृत्विजे कर्म कुर्वते| अलंकृत्य सुतादानं  दैव धर्मं प्रचक्षते||[24]
इस विधि का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण, ऋषयश्रृंग और शांता का विवाह है|
आर्ष-विवाह: इस विवाह की विधि आसुर विवाह का शुद्ध रूप है| इसमें कन्या का पिता वर पक्ष से प्रतिक रूप में एक या दो गो-मैथुन (एक गाय और एक बैल) को लेकर अपनी कन्या का विवाह करता है| मनु कहते है कि–     गोमिथुनं द्वे वा वरादादाय धर्मत:| कन्याप्रदानं विधिवदार्षो धर्म: स उच्यते|[25] अगस्त्य-लोपामुद्रा का विवाह इसका उदाहरण है|
प्राजापत्य-विवाह:तुम दोनों धर्म में प्रवृत्त होकर सुसंतति का प्रजनन करो’ वर–वधु द्वारा इस नियम की स्वीकृति प्राप्त हो जाने पर देव-पितृ पूजन के साथ जो कन्यादान किया जाता है उसको प्राजापत्य विवाह कहते है-
         सहोभौ चरतां धर्ममिति वाचाsनुभाष्य च| कन्याप्रदानमभ्यर्थ्यम् प्राजापत्यो विधि: स्मृत:||[26]
इस कथन को चाणक्य भी स्वीकारते है- सहधर्मचर्या प्राजापत्य:|[27]
इस विवाह का प्रमुख उद्देश्य सुसंतति प्रजनन करना है| नव-दम्पति को विवाह सूत्र में आबद्ध होने से पूर्व विवाहाग्नि के समक्ष इस प्रतिज्ञा को स्वीकार करना आवश्यक होता है| उपरोक्त चार विवाहों का वात्स्यायन केवल संकेत करते है, विस्तृत रूप से व्याख्यायित नहीं करते है|
आसुर-विवाह: जब वर पक्ष के द्वारा अपनी शक्त्यानुसार कन्या के पिता या सम्बन्धी को धन देकर यदि विवाह करें, तो उसे आसुर विवाह कहते है– शुल्कदानादासुर:|[28] वात्स्यायन कहते है कि यदि मनपसंद कन्या गरीब हो तो नायक को चाहिए कि वह उसके माता-पिता को धन देकर उससे विवाह करें–
अप्रतिपद्यमानायामन्श्चारिणीमन्यां कुल प्रमदां पूर्वसंसृष्टा प्रीयमाणाम् चोपगृह्य तया सह विषह्यमवकाशमेनामन्यकार्यापदेशेनानाययेत्|[29]
गान्धर्व-विवाह: इसमें वर और कन्या में प्रेम एवं आकर्षण हो जाने पर विवाह होता है, इसलिए यह गान्धर्व विवाह कहलाता है| इसमें जिस कन्या से युवक प्रेम करना चाहता है वह युवक उसकी सखी से निरंतर परिचय बढ़ाएं–
      यां च विश्वास्यामस्याम् मन्येत तया सह निरंतरां प्रीतिं कुर्यात्| परिचर्याश्च बुध्येत||[30]
उस कन्या की धाय की पुत्री को भी प्रिय और हितकर बातों से अपनी ओर मिला लें| क्योंकि यदि धाय की कन्या वशीभूत हो जाती है तो वह प्रसन्न होकर बिना कहे ही उसके हाव-भावों को जानकर प्रेयसी से मिलाने का प्रयास करती है–
धात्रेयिकां चास्या: प्रियहिताभ्यामधिकमुपगृहणीयात्| सा हि प्रियामाणा विदिताकाराप्यप्रत्यादिशन्ती तं तां च    योजयितुम् शक्नुयात् अनभिहितापि प्रत्याचार्यकम्|[31]
इसके बाद नायिका की सखी नायक के अनुराग एवं गुणों को इस प्रकार नायिका के सामने प्रकट करें कि नायिका नायक पर अनुरक्त हो जाए– अविदिताकारापि हि गुणानेवानुरागात्प्रकाशयेत्| यथा प्रयोज्यानुरज्येत||[32]
नायिका को वश में करने के लिए नायक उसके प्रयोज्य और मनोरंजन की वस्तुयें उसे लाकर देवें-
                         यत्र यत्र च कौतुकं प्रयोज्यायास्तादनु प्रविश्य साधयेत् |[33]
गान्धर्व विवाह वात्स्यायन के अनुसार सर्वोत्तम है क्योंकि विवाह का उद्देश्य प्रेम को प्राप्त करना है| नायक और नायिका में प्रेम हो जाने पर, वे अपने–अपने माता-पिता से बता दें, तथा अग्नि को साक्षी मानकर विवाह करलें एवं अपना जीवन आनंद से व्यतीत करें|
राक्षस-विवाह: कन्या पक्ष को परास्त करके अथवा कन्या का बलात् अपहरण करके विवाह करना राक्षस–विवाह कहलाता है– दुहितृमत: प्रोथयित्वाssवहेरेन् स राक्षस|[34]  प्रसह्यादानाद् राक्षस:|[35]
जब किसी अभीष्ट या मनचाही कन्या के माता-पिता या सम्बन्धियों को मार-काट क्र तथा घर को फोड़कर रोटी-चिल्लाती हुई कन्या को बल पूर्वक उठाकर अपहरण किया जाए तो उसे राक्ष विवाह कहते है|
पैशाच–विवाह: सोती हुई, मदहोश, उन्मत्त या मद्यपान की हुई कन्या के साथ बलात् सम्बन्ध बनाने के बाद जब व्यक्ति उसके साथ विवाह करता है, तो वह विवाह पैशाच कहा जाता है-
             सुप्तां मत्तां प्रमत्तां वा रहो यत्रोपच्छति | स पापिष्ठोविवाहानां पैशाचाश्चाष्टमोsधम: ||[36]
यह विवाह निष्कृष्ट विवाह के अंतर्गत आता है| अत: इस प्रकार से वात्स्यायन ने धर्मशास्त्र की दृष्टि से ब्राह्म, आर्ष, प्राजापत्य आदि आठों प्रकार के विवाहों में पूर्व विवाह–विधि अपने उत्तरवर्ती विवाह-विधि की अपेक्षा श्रेष्ठ है-
पूर्व: पूर्व: प्रधानं स्याद्विवाहो धर्मत: स्थिते| पूर्वाभावे तत: कार्यो यो य उत्तर उत्तर||[37]
अर्थात् पैशाच से राक्षस, राक्षस से गान्धर्व, गान्धर्व से आसुर, आसुर से प्राजापत्य, प्राजापत्य से आर्ष, आर्ष से दैव और दैव से ब्राह्म विवाह श्रेष्ठ है| प्रथम चार विवाह धर्मसंगत और उचित है परन्तु अन्य धर्मविरुद्ध है| प्रथम चार से उत्पन्न संतान चरित्रवान होती है क्योंकि उससे राष्ट्र का निर्माण होता है| किन्तु आगे के चार मानसिक कमजोरियों के संकेतक है| सातवां और आठवां विवाह तो नितांत रूप से पाशविक है| इसीलिए श्रेष्ठ विवाह करने का प्रयास करना चाहिए|

उपसंहार: इस प्रकार वात्स्यायन ने विवाह संस्कार पर विशेष बल देकर उल्लेख किया है, और सभी पक्षों को बहुत ही मार्मिकता के साथ रखा है| विवाह संस्कार सभी संस्कारों का मूल है, यदि विवाह ही न होगा तो संतान ही उत्पन्न नहीं होगी, तो अन्य सभी संस्कार कैसे फलीभूत होंगे| विवाह किसी भी देश, समाज के विकास के लिए महत्त्वपूर्ण योगदान देता है| विवाह के द्वारा ही स्त्री और पुरुष का मन एकाग्रचित्त होता है और गृहस्थ जीवन के माध्यम से वे अपना विकास और देश का विकास करते है| परन्तु विवाह में शुद्धता और विश्वास बहुत ही आवश्यक है, नहीं तो समाज पथभ्रष्ट हो जाएगा| इसीलिए विवाह संस्कार को धर्मशास्त्रों के अनुसार विधि-विधान से करना चाहिए क्योंकि विवाह संस्कार समाज का रीढ़ है|










सन्दर्भ ग्रन्थ सूची
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[1]  पार०गृ० १.३.
[2]  पार०गृ०सू० १.३.६
[3] पार०गृ०सू० १.३.८
[4]  ध. शा . का इति.
[5] गौ.ध.सू. १.८२२
[6] का. सू. १.२.२
[7] का. सू. १.२.६
[8] का. सू. १.४.१
[9] श. ब्रा. ५.२.१.१०
[10] का. सू. १.४.१
[11] का. सू. १.५.१
[12] का. सू. ३.१.१
[13] का. सू. ३.५.२९
[14] का. सू. ३.१.८
[15] का. सू. ३.१.९
[16] का. सू. ३.१.१५
[17] का. सू. ३.१.१६
[18] मनुस्मृति ३.२१
[19] विष्णुपुराण ३.१०.२४
[20] का. सू. ३.१.१९
[21] आपस्तम्बधर्मसूत्र २.११.१७.
[22] अर्थशास्त्र ३.२.२
[23] आपस्तम्बधर्मसूत्र. २.११.१८
[24] मनुस्मृति ३.८
[25] मनुस्मृति ३.२९
[26] मनुस्मृति ३.३०
[27] अर्थशास्त्र ३.२
[28] अर्थशास्त्र ३.२
[29] कामसूत्र ३.५.१९
[30] कामसूत्र ३.३.९
[31] कामसूत्र ३.५.१०
[32] कामसूत्र ३.५.११
[33] कामसूत्र ३.५.१२
[34] आपस्तम्बधर्मसूत्र २.१२.२
[35] अर्थशास्त्र ३.२
[36] मनुस्मृति ३.३४
[37] कामसूत्र ३.५.२८