Sunday, 4 May 2025

डॉ. राघवेन्द्र मिश्र

(लेखक: डॉ. राघवेन्द्र मिश्र)

जातियों की गिनती नहीं,
यह पहचान का स्वर है।
वंचितों की पीड़ा का,
अब आँकड़ों में उज्वर है।

1931 की छाया से,
आज भी नीतियाँ चलतीं,
बिना सम्यक् आधार के,
अधूरी योजनाएँ पलतीं।

शिक्षा में जो पीछे हैं,
वे दिखते नहीं नज़रों को,
इस गणना से मिलेगा स्वर,
शोषित हुए मन के हजरों को।

कहाँ हैं वे हस्तकार,
जो रचते लोक-संस्कृति,
जाति के आँकड़े खोलेंगे,
हमारी सच्ची विरासतो की सुकीर्ति।

राजनीति में जो छूट गए,
प्रतिनिधित्व से कोसों दूर,
अब जनगणना लाएगी,
उनके अधिकारों का नूर।

न्यायालय की वाणी भी कहे,
"बिन आँकड़े न हो आरक्षन",
यह है संविधान की पुकार,
न्याय की सच्ची परिभाषा बन।

संदेहों के धुंध छटेंगे,
यदि नीति हो निष्पक्ष,
गोपनीयता, पारदर्शिता से,
बनेगा नया सामाजिक चित्र सुविपक्ष।

यह जनगणना नहीं मात्र गिनती,
यह भविष्य की नींव है।
जहाँ हर वर्ग को मिलेगा स्थान,
जहाँ समरसता ही नीति की घीव है।

@Dr. Raghavendra Mishra 

डॉ. राघवेन्द्र मिश्र 

“बोलो भारत! क्या तुम जानें, कौन तुम्हारा अपना है?”

(रचनाकार: डॉ. राघवेन्द्र मिश्र)

बोलो भारत! क्या तुम जानें,
कौन तुम्हारा अपना है?
किसके आँचल में है सूखा,
किसके माथे सपना है?

कौन पढ़ा है, कौन अड़ा है,
किसके द्वार न रोटी आई?
किसके बच्चे अब भी रोते,
किसने पुस्तक छू न पाई?

गांव-गांव में गीत बची है,
पर गीतों के रचयिता कहां?
किस लोहार की थाप बुझी है,
किसी  छुपे जुलाहे का जहां?

जाति नहीं कोई दीवारें हैं,
वे तो परिचय का दर्पण हैं,
जो बिछुड़ गए इस भीड़ में,
उनकी आवाज समर्पण हैं।

यदि न गिनोगे अब तुम उनको,
कैसे नीति बनेगी रे?
बिन पहचाने क्या उपचार हो,
बिन आँकड़ें पीड़ा टलेगी रे?

जाति-गणना नहीं विभाजन है,
यह तो आँसू मापेगी,
जो घुप अंधेरे में बैठे थे,
उन्हें उजाले बाँटेगी।

गिनती से डर क्यों भारत को?
जब न्याय हो अंतिम लक्ष्य,
जनगणना से ही तो होगा,
समता का रथयात्रा सत्य!

@Dr. Raghavendra Mishra 

डॉ. राघवेन्द्र मिश्र 

जाति जनगणना : एक दूरदर्शी कदम या सामाजिक समरसता की पुनर्रचना?

लेखक : डॉ. राघवेंद्र मिश्र
(संस्कृत भाषाविद् एवं सामाजिक विमर्शकर्ता)

भारत एक बहुस्तरीय, बहुसांस्कृतिक, और बहुजातीय राष्ट्र है, जहाँ सामाजिक संरचना सदियों से जातियों के आधार पर निर्मित रही है। ऐसी स्थिति में जातिगत आंकड़ों का सम्यक् संकलन केवल प्रशासनिक आवश्यकता नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की नींव है। यदि मोदी सरकार जातिगत जनगणना का निर्णय लेती है, तो यह कदम भारतीय समाज की आकांक्षाओं को एक नया स्वर दे सकता है।

सटीक आंकड़ों की आवश्यकता क्यों?

1931 के बाद से भारत में जाति आधारित कोई पूर्ण जनगणना नहीं हुई। परिणामस्वरूप, नीतियों का निर्माण अनुमान, परंपरा और राजनीतिक गणनाओं पर आधारित रहा। सामाजिक न्याय की योजनाओं, जैसे आरक्षण, छात्रवृत्तियाँ, और विशेष कल्याण कार्यक्रम, तब तक प्रभावी नहीं हो सकतीं जब तक यह न जाना जाए कि कौन-से समुदाय आज भी सामाजिक-शैक्षिक रूप से वंचित हैं।

शिक्षा में बदलाव का द्वार

जातिगत जनगणना से यह स्पष्ट हो सकेगा कि कौन-से समुदाय अब भी साक्षरता, उच्च शिक्षा और तकनीकी ज्ञान से वंचित हैं। इससे सरकार लक्षित योजनाओं की घोषणा कर सकती है – जैसे छात्रवृत्ति, कोचिंग, या विशेष आवासीय विद्यालय। इससे वास्तविक वंचितों को लाभ मिल सकेगा, बजाय इसके कि सुविधाएं केवल उन्हीं तक सीमित रहें जिन्होंने पहले ही सामाजिक सीढ़ियाँ चढ़ ली हैं।

सांस्कृतिक पुनरुद्धार का अवसर

जातियाँ केवल सामाजिक इकाइयाँ नहीं, बल्कि सांस्कृतिक पहचान की संवाहक भी हैं। लोकनाट्य, संगीत, हस्तशिल्प और परंपराएँ प्रायः जातिगत समुदायों में सुरक्षित रही हैं। जब इनका दस्तावेजीकरण जाति जनगणना के माध्यम से होगा, तो भारत की बहुरंगी सांस्कृतिक विविधता को वैश्विक मंच पर पहचान मिल सकती है। यह यूनेस्को की "Intangible Cultural Heritage" सूची में और अधिक भारतीय परंपराओं को स्थान दिलाने में सहायक हो सकता है।

राजनीतिक प्रतिनिधित्व में संतुलन

जनगणना के आंकड़े यह उजागर कर सकते हैं कि किन जातियों को अपेक्षाकृत कम राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिला है। इससे निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्रचना और पंचायतों से लेकर संसद तक प्रतिनिधित्व में सुधार संभव हो सकेगा। इससे लोकतंत्र अधिक समावेशी और पारदर्शी बनेगा।

कानूनी और संवैधानिक परिप्रेक्ष्य

सर्वोच्च न्यायालय ने इंद्रा साहनी बनाम भारत सरकार (1992) और विकास किशनराव गवली बनाम महाराष्ट्र सरकार (2021) जैसे मामलों में स्पष्ट कहा है कि आरक्षण और प्रतिनिधित्व के लिए अद्यतन जातिगत आंकड़े आवश्यक हैं। ऐसे में जाति जनगणना केवल सामाजिक नीति नहीं, एक संवैधानिक आवश्यकता बन जाती है।

संभावित चुनौतियाँ और समाधान

निःसंदेह, जाति जनगणना को लेकर समाज में आशंकाएँ हैं – जैसे सामाजिक विभाजन, राजनैतिक ध्रुवीकरण, या आंकड़ों के दुरुपयोग का भय। परंतु पारदर्शी प्रक्रिया, डेटा गोपनीयता का पालन, और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से यह आशंकाएँ निर्मूल सिद्ध की जा सकती हैं।

अंततः जाति जनगणना केवल एक गणना नहीं, यह सामाजिक पुनर्रचना का युगांतकारी प्रयास हो सकता है। यह भारत को केवल समृद्ध नहीं, समरस भी बना सकता है – जहाँ नीति, प्रतिनिधित्व, और संसाधनों का वितरण आंकड़ों और न्याय पर आधारित हो। यदि यह कार्य व्यापक दृष्टि और संवेदनशीलता से संपन्न होता है, तो आने वाले दशकों में भारत एक नई सामाजिक चेतना का साक्षी बन सकता है।

@Dr. Raghavendra Mishra 

डॉ. राघवेन्द्र मिश्र

कविता: "कर्म की कसौटी, जाति नहीं"
लेखक: डॉ. राघवेंद्र मिश्र

जाति न थी कोई दीवार,
न था कोई भूगोल प्रकार,
भारत की माटी कहती थी,
तब एक गंगा बहती थी ।

ऋषियों ने न गिना रक्त रंग,
न माँगा जाति का कोई संग,
कर्म ही था पहचानों का धर्म,
गुण ही था कुल का तब मर्म।

फिर आई आँधी विदेशी चाल,
बाँट दिए वे नस्ल के जाल,
जनगणना में अंकित कर दिया,
कौन बड़ा, क्या,  किसको लिया।

टेम्पल-रीस्ले की लेखनी ने,
सभ्यता बाँटी फेकनी में,
सनातन को खंड-खंड कर,
खड़ा किया फिर 'जाति' के प्रश्न पर।

अब फिर वही इतिहास रचा है,
सत्ता ने जाल नया बिछाया है,
गिनती में इंसान नहीं देखे,
केवल जाति के टुकड़े देखे।

विद्यालयों में संवाद मरेगा,
भाईचारा भी पीछे हटेगा,
छात्र अब जात पूछकर लड़ेंगे,
ज्ञान नहीं, पहचान पढ़ेंगे।

गाँव-गाँव में बातें होंगी,
“तेरा कुल क्या?”, “तू किस गिनती में?”
नैतिकता का दीप बुझेगा,
राजनीति फिर जाति में सजेगा।

क्या यही है समता की चाह?
या पुनः वही विघटन की राह?
बोलो भारत, क्या बनना है?
एक राष्ट्र या बिखरा समाज?

कर्म से बड़ा कुछ और नहीं,
गुण ही कुल की ज्योति सही,
जाति नहीं हो नीति की जड़,
सत्य वही जो किया समाज को बड़ ।

उठो युवा! पहचानो मूल,
ना बाँटो माटी जाति के उसूल,
ज्ञान, करुणा, तप और त्याग,
बने फिर भारत का नया राग।

@Dr. Raghavendra Mishra 
जातीय जनगणना की ऐतिहासिक और वर्तमान पृष्ठभूमि में खड़ी सामाजिक चुनौतियों पर प्रश्न उठाते हुए भारत की सनातन परंपरा को कर्म, गुण और समरसता की कसौटी पर पुनः प्रतिष्ठित करने का आह्वान करती है।

जातीय जनगणना पर आधारित एक गंभीर, विचारशील और प्रेरक कविता, जो भारत में सामाजिक चेतना को जगाने और सनातन दृष्टि को पुनर्स्थापित करने का प्रयास कर रही है।

डॉ. राघवेन्द्र मिश्र 

संपादकीय आलेख

शीर्षक:
"जातीय जनगणना: सामाजिक न्याय की ओर या सामाजिक विघटन की राह?"


लेखक: डॉ. राघवेंद्र मिश्र

भारत एक बहुजातीय, बहुभाषीय, और बहुसांस्कृतिक राष्ट्र है, जिसकी आत्मा “एकता में अनेकता” की अवधारणा से पोषित होती रही है। परंतु आज जातीय जनगणना की माँगें जिस गति और राजनीतिक समर्थन के साथ उठ रही हैं, वह केवल आंकड़ों के संग्रह की प्रक्रिया नहीं, बल्कि समाज के ताने-बाने को दोबारा औपनिवेशिक खांचों में बाँधने का प्रयास बनता जा रहा है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:
ब्रिटिश शासनकाल में 1871 से प्रारंभ हुई जातीय जनगणना की परंपरा ने समाज को ‘जाति’ के स्थायी वर्गों में विभाजित कर दिया। 1931 की जनगणना आखिरी बार थी जब विस्तृत जातीय आंकड़े प्रकाशित हुए। रीस्ले जैसे अफसरों ने जातियों को नस्ल और शारीरिक विशेषताओं से जोड़कर सामाजिक ऊँच-नीच की एक कृत्रिम और कठोर व्यवस्था थोप दी। यह “फूट डालो और राज करो” की स्पष्ट रणनीति थी।

वर्तमान भारत के संदर्भ में संभावित हानियाँ:

  1. सामाजिक विघटन और पहचान की राजनीति:
    जातीय जनगणना से राजनीतिक दलों को समाज को विभाजित करने का औपचारिक औजार मिल जाता है। टिकट वितरण, घोषणापत्र और नीति निर्माण जातिगत आंकड़ों पर केंद्रित होने लगते हैं, जिससे 'भारतीय नागरिक' की पहचान दब जाती है और 'जाति आधारित मतदाता' उभरता है।

  2. सनातन संस्कृति के विरुद्ध:
    भगवद्गीता में वर्ण व्यवस्था गुण और कर्म पर आधारित है (चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः)। परंतु जातीय जनगणना इस लचीले दर्शन को जन्म आधारित जातियों में सीमित कर देती है, जिससे सांस्कृतिक एकात्मता खंडित होती है।

  3. शिक्षा प्रणाली पर प्रतिकूल प्रभाव:
    विश्वविद्यालयों में जातिगत ध्रुवीकरण और छात्र संगठनों में वर्ग संघर्ष जैसी स्थिति पहले ही देखी जा रही है। जातीय आंकड़े सामने आने पर आरक्षण की माँगें और विरोध-प्रतिक्रिया बढ़ सकती हैं, जिससे शिक्षण संस्थानों का वातावरण कटु हो सकता है।

  4. Merit और आर्थिक आधार की उपेक्षा:
    नई शिक्षा नीति (2020) और नीति आयोग आर्थिक न्याय एवं कौशल आधारित विकास की बात करते हैं, लेकिन जातीय आंकड़ों के राजनीतिक दुरुपयोग से प्रतिभाशाली किनारे हो सकते हैं और समाज में नई असमानता जन्म ले सकती है।

  5. पीढ़ियों में अपराधबोध और प्रतिशोध:
    इतिहास के अन्याय का बोझ अगर आज की पीढ़ियों पर लादा जाएगा, तो समाज दो वर्गों में बँट सकता है — एक अपराधबोध से ग्रस्त और दूसरा प्रतिशोध से प्रेरित। इससे सामाजिक समरसता असंभव हो जाएगी।

क्या यह सामाजिक न्याय का मार्ग है?
निश्चित ही समाज में पिछड़ों के उत्थान के लिए योजनाएँ बननी चाहिए, परंतु उनकी नींव जाति नहीं, बल्कि आर्थिक, शैक्षणिक और सामाजिक जरूरतों पर आधारित होनी चाहिए। वरना जातीय जनगणना एक ऐसी आग बन सकती है, जिसमें सामाजिक समरसता की सारी पूँजी जलकर राख हो जाएगी।

अतः भारत को यदि 21वीं सदी में ज्ञान, विज्ञान, और नवाचार का अग्रणी बनना है, तो उसे पहचान की नहीं, परिचय की राजनीति अपनानी होगी — जहाँ हर नागरिक का मूल्यांकन उसके कर्म, योग्यता और योगदान से हो, न कि उसकी जाति से।

@Dr. Raghavendra Mishra 

 समाचार पत्रों में संपादकीय प्रकाशन हेतु: 


*जातीय जनगणना: ब्रिटिश नीति की छाया और भारतीय समाज का विखंडन*


लेखक:

डॉ. राघवेन्द्र मिश्र (विजिटिंग फैकल्टी, NSD, नई दिल्ली और काशी विद्वत परिषद, सदस्य, काशी, वाराणसी, उत्तर प्रदेश)


भारत में सामाजिक संरचना की जटिलता और विविधता को समझने का प्रयास जितना प्राचीन है, उतना ही उसे राजनीतिक लाभ के लिए प्रयोग करना एक आधुनिक औपनिवेशिक विरासत है। इस प्रक्रिया का आरंभ औपचारिक रूप से वर्ष 1871 में हुआ, जब ब्रिटिश राज ने भारत की पहली जातीय जनगणना कराई। इसके पीछे का उद्देश्य भारतीय समाज को समझना नहीं, बल्कि उसे बाँटना था — ताकि 'फूट डालो और राज करो' की नीति को सुदृढ़ किया जा सके।


जातीय जनगणना की यह परंपरा ब्रिटिश शासन के अंतिम वर्षों तक चली। विशेषतः एच.एच. रीस्ले जैसे अधिकारियों ने जाति को एक जैविक-नस्लीय पहचान बना दिया। उनके अनुसार, जातियाँ जन्म से निर्धारित होती हैं और शारीरिक विशेषताओं के आधार पर उनकी श्रेष्ठता या हीनता तय की जा सकती है। यह दृष्टिकोण न केवल वैज्ञानिक रूप से त्रुटिपूर्ण था, बल्कि भारतीय समाज की आत्मा के भी विपरीत था।


भारतीय समाज की पारंपरिक वर्ण व्यवस्था, जो कर्म और गुण पर आधारित थी (जैसा कि भगवद्गीता में वर्णित है — चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः), उसे ब्रिटिशों ने कठोर, अपरिवर्तनीय जातियों में बदल दिया। यह प्रक्रिया न केवल सामाजिक गतिशीलता को बाधित करने वाली थी, बल्कि लोगों की आत्म-छवि, सामाजिक संबंधों और सांस्कृतिक सामंजस्य को भी क्षीण करने वाली सिद्ध हुई।


जातीय जनगणना से उत्पन्न वर्गीकरण ने समाज में कृत्रिम दीवारें खड़ी कीं। ‘उच्च’ और ‘निम्न’, ‘लड़ाकू’ और ‘अलड़ाकू’, ‘शुद्ध’ और ‘अशुद्ध’ जैसी श्रेणियाँ गढ़ी गईं, जिससे सामाजिक असमानता को राज्य द्वारा मान्यता मिल गई। इससे उपजी हीनता-बोध और जातिगत प्रतिस्पर्धा ने स्वतंत्र भारत की राजनीति को भी जाति के दलदल में धकेल दिया। यह विडंबना ही है कि आज भी हम इस औपनिवेशिक ढांचे के आंकड़ों और उसकी मानसिकता से मुक्त नहीं हो सके हैं।


स्वतंत्र भारत ने 1951 से जनगणनाओं की परंपरा जारी रखी, लेकिन 1931 के बाद किसी भी जनगणना में जातिगत आंकड़े प्रकाशित नहीं किए गए। हालांकि, 2011 में सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना (SECC) अवश्य कराई गई, पर उसके आंकड़े अब तक सार्वजनिक नहीं हुए हैं। इसका कारण शायद यही है कि इन आंकड़ों का उपयोग समाज को जोड़ने के बजाय राजनीतिक ध्रुवीकरण के लिए अधिक किया जाता रहा है।


आज आवश्यकता इस बात की है कि हम जातीय पहचान को सामाजिक सशक्तिकरण का माध्यम बनाएं, न कि सामाजिक विभाजन का औजार। यह तभी संभव है जब हम इतिहास की गलतियों से सीखें और एक समतामूलक, विवेकशील समाज की दिशा में बढ़ें।


अंत में यही कहना है कि जातीय जनगणना का इतिहास एक चेतावनी है कि आंकड़े यदि संवेदनशील सामाजिक प्रश्नों को संतुलन से न नापें, तो वे समाज के लिए विघटनकारी औजार बन सकते हैं। ब्रिटिशों ने इस नीति के माध्यम से भारत को विभाजित किया, लेकिन क्या हम आज भी उसी खांचे में सोचते रहेंगे?


(लेखक संस्कृत भाषा, साहित्य भारतीय संस्कृति के विद्वान एवं सामाजिक विषयों पर शोधकर्ता हैं।)

डॉ. राघवेन्द्र मिश्र 

जातीय जनगणना पर आधारित एक गंभीर और विचारपूर्ण गीतात्मक कविता, जो भारतीय समाज पर इसके प्रभाव को भावनात्मक और वैचारिक रूप में प्रस्तुत करता है ।

कविता "जाति की जंजीरें"
लेखक: डॉ. राघवेंद्र मिश्र

जब भारत थी जननी समान,
सबको देखे एक समान,
न था कोई ऊँच-नीच का भाव,
सबको मिलता था सत्प्रभाव।

फिर आया इक फिरंगी तंत्र,
जिसने रचा कूटनीति का मंत्र,
बाँट दिया समाज चाल से,
जाति बाँध दी नस्ल जाल से।


एकहत्तर में पहला वार हुआ,
जनगणना में जाति प्रचार हुआ,
टेम्पल और रीस्ले की लेखनी,
बाँट गए भारत की रेखनी।

जातियाँ बनीं आँकड़ों की कथा,
शुद्ध-अशुद्ध की चली व्यथा,
कर्म से नहीं, वंश से पहचान,
गुण नहीं, जात बना सम्मान।

जो था लचीला, कठोर हो गया,
जो था जीवित, चिताभस्म हो गया,
वर्णों की गति जाति में सिमटी,
नस्ल की राजनीति भीतर चिमटी।

बनाया जिसे धर्म ने साधन,
उसे बना दिया फूट का कारन,
भाई-भाई में दरारें पड़ीं,
संघर्ष की कालिखें गहरी चढ़ीं।

आज भी वही आंकड़े बोझ हैं,
जातीय राजनीति की खोज हैं,
न्याय का नहीं, गिनती का सवाल,
सत्ता के हाथों बँटे हैं काल।

उठो भारत, पहचानो मूल,
जाति नहीं है निजता का उसूल,
कर्म से हो फिर से मूल्यांकन,
न हो कभी नस्लीय आंकलन।

गीत नहीं यह, चेतावनी है,
जागृति की इक साधना बनी है,
तोड़ो अब ये जंजीर पुरानी,
बनाओ नव भारत की कहानी।

@Dr. Raghavendra Mishra

यह गीत ब्रिटिश काल की जातीय जनगणना की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और उसके सामाजिक परिणामों को काव्यात्मक रूप में व्यक्त करता है। यह गीत भारतीयों से सामाजिक समरसता, कर्म आधारित मूल्यांकन, और जातिगत बंधनों को तोड़ने का आह्वान करता है।