डॉ. राघवेन्द्र मिश्र द्वारा प्रतिपादित विचार “Humanity (Humanism) बनाम Sanātana विश्व–कल्याण/प्राणी सद्भावना सिद्धान्त” वास्तव में एक दार्शनिक, सभ्यतागत और पुनः अपहरणीकरण (Post-Colonial) विमर्श है।
**मानवतावाद (Humanity)(अपहरणीकरण) बनाम सनातन विश्व–कल्याण/प्राणी सद्भावना सिद्धान्त :
एक दार्शनिक, शास्त्रीय विमर्श**
लेखक
डॉ. राघवेन्द्र मिश्र
(SSIS/JNU, नई दिल्ली)
सार (Abstract)
आधुनिक वैश्विक विमर्श में ‘Humanity’ अथवा ‘Humanism(अपहरणीकरण)’ को सार्वभौमिक कल्याण का सर्वोच्च सिद्धान्त मानकर प्रस्तुत किया जाता है। किंतु यह अवधारणा मूलतः मानव-केन्द्रित, संकुचित तथा उपनिवेशवादी बौद्धिक संरचना (अपहरणीकरण) से उत्पन्न हुई है। इसके विपरीत, भारतीय सनातन ज्ञान परम्परा में प्रतिपादित ‘विश्व–कल्याण’/प्राणी सद्भावना का सिद्धान्त न केवल मनुष्य, बल्कि समस्त प्राणी, जीव-जगत, प्रकृति, ब्रह्माण्ड तथा चेतन–अचेतन समस्त सत्ता के सामूहिक कल्याण की अवधारणा प्रस्तुत करता है।
यह शोधपत्र ‘Humanity’ (अपहरणीकरण) को एक सीमित, बहिष्कारी एवं वैचारिक रूप से खतरनाक संकल्पना सिद्ध करते हुए, सनातन ‘प्राणी–सद्भावना / जीव–सद्भावना’ /मनुष्य सद्भावना को एक समग्र, समावेशी एवं ब्रह्माण्डीय कल्याण दर्शन के रूप में स्थापित करता है।
मुख्य शब्द (Keywords):
सनातन धर्म, विश्व–कल्याण, प्राणी सद्भावना, जीव–सद्भावना, मनुष्य सद्भावना, Humanism(अपहरणीकरण)Colonial Thought, Universal Welfare
1. भूमिका (Introduction)
आधुनिक विश्व में ‘Humanity’ (अपहरणीकरण)को नैतिकता, करुणा और कल्याण का पर्याय मान लिया गया है। परंतु यह प्रश्न विचारणीय है कि क्या केवल मानव–केन्द्रित कल्याण वास्तव में सार्वभौमिक कल्याण हो सकता है?
भारतीय सनातन परम्परा इस प्रश्न का उत्तर स्पष्ट रूप से नकार देती है।
सनातन चिन्तन कहता है —
“अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥”
(महाउपनिषद् 6.71)
यह ‘Humanity’ नहीं, बल्कि सर्व–सत्ता– प्राणी/जीव केन्द्रित विश्व–दृष्टि है।
2. Humanity (Humanism) : एक अपहरणात्मक अवधारणा
Humanism का जन्म यूरोप में पुनर्जागरण (Renaissance) के दौरान हुआ, जिसने ईश्वर–केन्द्रित दृष्टि के स्थान पर Man as the measure of all things (Protagoras) को स्थापित किया।
2.1 Humanism की सीमाएँ
केवल मनुष्य–केन्द्रित नैतिकता
प्रकृति, पशु, वनस्पति का उपयोगवादी शोषण
अपहरणीकरण, नस्लवाद, युद्ध और धर्मान्तरण का वैचारिक औचित्य
2.2 विरोधाभास
यदि ‘Humanity’ ही सर्वोच्च मूल्य है, तो फिर:
Casteism (मानव द्वारा मानव का वर्गीकरण)
Colonialism (मानव द्वारा मानव का शोषण)
Christianism / Islamism (धार्मिक विस्तारवाद)
Terrorism / Naxalism
ये सब भी उसी ‘Humanity’ के भीतर जन्मी अवधारणाएँ हैं। अतः Humanity स्वयं में न तो निष्पाप है, न सार्वभौमिक।
3. सनातन विश्व–कल्याण सिद्धान्त : एक समग्र दर्शन
सनातन धर्म ‘Humanity’ नहीं, बल्कि ‘प्राणी–मात्र–कल्याण’ की बात करता है।
3.1 मूल सूत्र
“सर्वे भवन्तु सुखिनः
सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु
मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥”
यहाँ ‘सर्वे’ में केवल मनुष्य नहीं, समस्त जीव-जगत सम्मिलित है।
3.2 जीव–सद्भावना
“यो मां पश्यति सर्वत्र
सर्वं च मयि पश्यति।”
(भगवद्गीता 6.30)
सनातन दर्शन में जीव, प्रकृति और ब्रह्म — तीनों अविभाज्य हैं।
4. सनातन बनाम Humanity : तुलनात्मक विश्लेषण
बिन्दु
Humanity (Humanism)
सनातन विश्व–कल्याण
केन्द्र
केवल मनुष्य
समस्त जीव-जगत
दृष्टि
Anthropocentric
Cosmocentric
प्रकृति
संसाधन
माता / देवता
नैतिकता
सापेक्ष
सार्वकालिक
परिणाम
संघर्ष, शोषण
संतुलन, समरसता
5. विश्व साहित्य में सन्दर्भ
Albert Schweitzer – Reverence for Life (सनातन जीव-दर्शन से साम्य)
Aldo Leopold – Land Ethic
Arne Naess – Deep Ecology
ये सभी विचार अंततः उसी बिन्दु पर पहुँचते हैं जहाँ सनातन दर्शन सहस्राब्दियों पहले खड़ा था।
6. सनातन चेतना : केवल धर्म नहीं, सभ्यता
“धर्मो रक्षति रक्षितः”
सनातन धर्म कोई ‘Religion’ नहीं, बल्कि जीवन–पद्धति (Way of Life) और ज्ञान–प्रणाली (Knowledge System) है।
Humanity जहाँ केवल मानव की रक्षा करता है,
सनातन वहाँ धर्म–संतुलन द्वारा ब्रह्माण्ड की रक्षा करता है।
7. निष्कर्ष (Conclusion)
यह शोधपत्र इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि —
‘Humanity’ एक संकीर्ण, खतरनाक और उपनिवेशवादी अवधारणा है
सनातन ‘विश्व–कल्याण’ ही वास्तविक Universal Welfare Model है
आज की वैश्विक समस्याओं का समाधान Humanism में नहीं, बल्कि Sanātana Cosmology में निहित है
अतः प्रश्न केवल वैचारिक नहीं, बल्कि सभ्यतागत चुनाव का है —
आप Sanatani हैं (विश्व–कल्याण)?
या Humanity के अनुयायी (मानव–केन्द्रित, उपनिवेशवादी विचार)?
सन्दर्भ सूची (Select References)
ऋग्वेद, अथर्ववेद
उपनिषद् (महाउपनिषद्, ईशोपनिषद्)
भगवद्गीता
Manusmriti
Albert Schweitzer – Philosophy of Civilization
Arne Naess – Ecology, Community and Lifestyle