Tuesday, 17 June 2025

युगानुकूल अर्थ रचना: दीनदयाल का समरस गीत

डॉ. राघवेन्द्र मिश्र JNU (लेखक/रचनाकार)

ना धन ही जीवन का अंतिम लक्ष्य, ना भूख ही अंतिम सत्य,
दीनदयाल ने कहा युग को अर्थ हो धर्ममय पथ।
न पूंजीवाद की दौड़ हो, न हो साम्यवाद की पीड़ा,
भारत को चाहिए अर्थनीति, जो संस्कृति का हो हीरा।।

युगानुकूल अर्थ-रचना हो, जो समय के संग चले,
परंतु मूल जड़ों से जुड़कर, संतुलन की भाषा कहे।
न हो विदेशी ढांचे पर आधारित, न हो अंध अनुकरण,
बल्कि स्वदेशी भावनाओं से, हो नव भारत का सर्जन।।

ग्राम हो विकास की धुरी, न हो केवल शहरों का भार,
कृषक, शिल्पी, कारीगर सबको मिले स्वाभिमान और प्यार।
स्थानीयता में हो सामर्थ्य, लघु उद्योग हों बलवान,
तब जाकर अर्थ-व्यवस्था बनेगी भारत की पहचान।।

श्रम को मिले प्रतिष्ठा, न हो हाथों का अपमान,
हर परिश्रमी जन बने वहां, स्वावलंबन का महान गान।
न सिर्फ़ लाभ हो उद्देश्य, न हो केवल उत्पादन,
धर्म हो अर्थ का नियंत्रक, यही हो नीतिपथ का निर्धारण।।

धर्म हो अर्थ का दीपक, नीति हो नैतिक छाँव,
प्रकृति के संग मैत्रीपूर्ण हो, हर विकास की नाव।
ना दोहन हो जल-जंगल का, ना विनाश हो जीवन का,
हर संसाधन में दिखे दर्शन एकात्मता के मन का।।

न मनुष्य बने बाज़ार की वस्तु, न समाज बने दास,
मानवता की हो विजय जहाँ, वहीं अर्थ का हो प्रकाश।
न हो उपभोक्तावाद का जाल, न ही संग्रह की भूख,
संयम, संतुलन और सेवा यही है जीवन का सुख।।

समाज हो सहभागी, सत्ता हो सेवक धर्मशील,
और अर्थ हो साधन, न कि साध्य यही हो लक्ष्य प्रवीण।
दीनदयाल ने यही बताया, विकास हो होश में,
न हो विस्मरण संस्कृति का, न हो पतन जोश में।।

धन हो दया का साधन, व्यापार बने समर्पण,
उद्योग हों धर्म से बँधे, श्रमिक हों आत्मार्पण।
युगानुकूल हो अर्थविचार, जो समय को साधे,
लेकिन मूल न खो दे कभी, संस्कृति को बाँधे।।

चलो उसी पथ पर अब फिर से, रचें नव संकल्प-विधान,
दीनदयाल के स्वप्नों का हो, उन्नत भारत एक महान।
जहाँ अर्थ न हो केवल अंक, बल्कि मूल्य और मान,
जहाँ हो मानव पूर्णतः समरस, और राष्ट्र सदा सृजन प्राण।।

@Dr. Raghavendra Mishra JNU 

त्रयी सत्य की गूंज: व्यष्टि, समष्टि और परमेष्ठि

(पं. दीनदयाल उपाध्याय जी के एकात्म मानवदर्शन पर आधारित काव्य प्रस्तुति)

डॉ. राघवेन्द्र मिश्र JNU (लेखक/रचनाकार)

ना व्यक्ति अकेला, ना समाज अधूरा,
ना परम सत्य बिना पथ पूरा।
तीनों बिंदु, तीन किरणें, एक ही दीप जलाएं,
दीनदयाल के दर्शन में, मानव धर्म जगाएं।

व्यष्टि: व्यक्ति की व्याप्ति


व्यष्टि वह बीज, जहां से जीवन का वृक्ष उगे,
शरीर, मन, बुद्धि, आत्मा चार धुरी जहाँ सधे।
न केवल पेट की भूख बुझे, न केवल बुद्धि में ज्वार,
मानव तभी पूर्ण कहलाए, जब आत्मा हो साकार।।

शरीर माँगे रोटी, मन माँगे नेह,
बुद्धि खोजे सत्य, आत्मा चाहे गेह।
इन सबका समन्वय ही मानव का मर्म,
दीनदयाल ने कहा यही है राष्ट्रधर्म।।

समष्टि: समाज का स्वरूप

व्यष्टियाँ मिलें, बने समष्टि यह है सहजीवन राग,
जहाँ जाति, पंथ, वर्ग न बाँटे, हर कोई में अनुराग।
परिवार से समाज तक, फिर राष्ट्र बने महान,
जहाँ सबका हो उत्थान, ना हो कोई अपमान।।

समष्टि ना भीड़ का नाम है, ना केवल शक्ति का जोर,
यह संस्कृति की बँधी हुई डोर, जिसमें बहे करुणा की भोर।
दीनदयाल कहते समष्टि वह तन है, व्यष्टि उसका प्राण,
दिशा वही दे सकती है, जो हो धर्मपरायण जान।।

परमेष्ठि: परम की प्रेरणा

परमेष्ठि वह शाश्वत सत्ता, जो सबका मूल आधार,
जिससे जीवन में बँधे नीति, धर्म, विवेक और प्यार।
ना वह केवल देवालयों में, ना ग्रंथों के वचन मात्र,
वह हर आत्मा में जाग्रत हो, यही है सनातन पात्र।।

धर्म न संप्रदाय बने, ना बाँटे वह नर-नारी,
धर्म दे जीवन की दशा, जो दे सबको जिम्मेदारी।
परमेष्ठि का पथ जब दिखे, समष्टि में बहे समरसता,
और व्यष्टि हो नतमस्तक यही हो पूर्ण एकात्मता।।


तीनों धारा जब बहती संग, तब जीवन सधता है,
व्यक्ति, समाज और परमेश्वर जब मिलें तो पथ बनता है।
दीनदयाल का एकात्म गीत, न भूले भारतवासी,
यह दर्शन है पथप्रदर्शक, यह संस्कृति की संजीवनी रासी।।

चलो चलें उस राह पर, जहाँ व्यष्टि की हो गरिमा,
समष्टि में बहे सेवा, परमेष्ठि से मिले अणिमा।
भारत फिर बने विश्वगुरु, दीनदयाल की राह,
जहाँ मानव न केवल जीव, बल्कि चेतना की चाह।।

@Dr. Raghavendra Mishra JNU 

 दीन दयाल उपाध्याय जी का राष्ट्रधर्म

(पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी के राष्ट्रवाद की सम्यक अवधारणा पर आधारित)

डॉ. राघवेन्द्र मिश्र JNU (लेखक/रचनाकार)

भारत भूमि ना केवल धरती, है यह संस्कृति की पुकार,
यहां हर कंकर शंकर है, हर गंगा सच्चा संसार।
हमने माना धरती माता, यह है आत्मा की अभिव्यक्ति,
दीनदयाल ने बताया राष्ट्र की है यही एकता सच्ची।।

न भूगोल से, न भाषा से, न जाति, धर्म, न संप्रदाय,
राष्ट्र वही जो एकात्म भाव से, आत्मविभोर होकर दे व्यापक छाय।
संस्कृति हो जिसकी आत्मा, धर्म हो जीवन का सार,
ऐसे राष्ट्र का निर्माण करें, जिसमें हो सबका आदर अपार।

"एकात्म मानवदर्शन" कहकर, जोड़ा सबको सूत्र एक,
व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और सृष्टि सबका हो समन्वय नेक।
धन न हो ध्येय अकेला, न भोग बने उद्देश्य,
कर्म-धर्म का हो आलोक, नीति से हो राष्ट्र विशेष।।

धर्म ना संप्रदाय मात्र, है कर्तव्य बोध महान,
राष्ट्रधर्म का मंत्र दिया हो सेवा, त्याग, बलिदान।
राजनीति हो पुण्य पथ, ना केवल सत्ता का व्यापार,
सिद्धांतों पर टिके कदम, न टूटे कोई सदाचार।।

समरसता का संदेश दिया, ना भेद हो न कोई विषमता,
हर मानव को मिले समानता, हर हृदय में हो आत्मीयता।
आर्थिक दृष्टि हो स्वदेशी, नीति हो शुभ भारतमातामयी,
दीनदयाल की यह विचारधारा, बन जाए राष्ट्र की अमर कथा जयी।।

जब पश्चिम जग हो चुका भ्रमित, खोज रहा विकास का सार,
भारत की सनातन दृष्टि दे रही समाधान अपार।
दीनदयाल के राष्ट्रवाद में, है केवल न भू-रचना,
यह है आत्मा, धर्म और संस्कृति की अविरल धारा-संरचना।।

चलो उसी पथ पर बढ़ें हम, जो दर्शन है दिव्य और सरल,
न हो विभाजन, न हो दंभ, हो आत्मगौरव का संबल।
राष्ट्र एक शरीर है पावन, जिसमें आत्मा संस्कृति महान,
दीनदयाल का यह राष्ट्रवाद, भारत का हो गौरवगान।।

@Dr. Raghavendra Mishra JNU 

एकात्म मानवदर्शन: भारत का आत्मस्वर 

डॉ. राघवेन्द्र मिश्र JNU (लेखक/रचनाकार)

अमृतकाल की देहरी पर, भारत खड़ा विराट,
दुविधा में डूबा है जग, पर दीपक बनें प्रभात।
प्रकृति सम्मत चिंतन से, सज्जित हो नवध्यान,
एकात्म दर्शन बन गया, भारत का परिमार्जन गान।।

शोषण में रत पश्चिम है, खोता चला विवेक,
भारत बोले सत्व से, मानव है सब एक।
न साम्यवाद, न पूँजीवाद, न रूखा कोई वाद,
मन, तन, आत्मा का संतुलन यही हमारा नाद।।

माटुंगा में गुंजी थी, स्वर-सरिता की लहर,
चार दिवसों में पंडित ने, खोल दिया सत्व-सागर।
22 से 25 अप्रैल, उन्नीस सौ पैंसठ की बात,
उदित हुआ चिंतन नक्षत्र, दीनदयाल का प्रकाश।।

“मैं नहीं सर्जक इसका”, बोले पावन स्वर,
“यह तो ऋषियों की विरासत, यह जाने भारत भर।”
गांव, गाय, गगन, गंगा सबमें ही आत्मा बसती,
जहाँ नदियाँ गाती जीवन, वहीं राष्ट्र की चिति हँसती।।

नर को न देखो टुकड़ों में, देखो समग्र रूप,
शरीर, मन, बुद्धि, आत्मा सब मिलकर बने स्वरूप।
धरा, गगन, जल, वायु, अग्नि पंचतत्त्व के मेल,
इनसे ही जीवन बने, इनसे ही जीवन खेल।।

ग्राम्य चेतना भारत की, उसका मूलाधार,
गांव उठेगा तभी जगेगा, भारत का सच्चा विचार।
धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चार पुरुषार्थ पवित्र,
यही बने जीवन सूत्र, यही हो नित्य चरित्र।।

विकास का मापदंड अपना, हम स्वयं गढ़ेंगे,
दीनदयाल की वाणी में, आत्मबल संप्रेषित देंगे।
नापेगा ना हमें कोई, पश्चिमी दर्पन से,
हम ही बनें उदाहरण, अपने ही दर्शन से।।

उनके सखा नानाजी ने,  दिया साधना की धार,
दीनदयाल शोध संस्थान से, किया विचार को साकार।
नीति से नीति तक पहुंचा, दर्शन का यह नाद,
भूमि पर उतरी चेतना, बनी जन-जन की बात।।

हे भारत! याद रखो यह, तुम्हारा स्वत्व महान,
एकात्म मानवदर्शन से, होय विश्वकल्याण।
राष्ट्रधर्म हो चेतना, संस्कृति हो आहार,
दीनदयाल के स्वप्न से, रचो नवसंस्कार।।

@Dr. Raghavendra Mishra JNU 

Wednesday, 11 June 2025

एकादशी मोदी युग: विकास, विश्वास और भारत के नवोदय की  गाथा (2014–2025)

डॉ. राघवेन्द्र मिश्र JNU (लेखक/रचनाकार)

यह काल केवल शासन नहीं, भारत के आत्मगौरव और आत्मनिर्भरता का नवजागरण है।

साल 2014 में जब देश ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व को स्वीकार किया, तब यह महज एक सरकार का गठन नहीं था यह जन अपेक्षाओं, आकांक्षाओं और आत्मनिर्भरता के युग का सूत्रपात था। आज जब हम 2025 की दहलीज़ पर खड़े हैं, तो यह कहने में कोई संकोच नहीं कि बीते ग्यारह वर्ष भारत के सांस्कृतिक उत्थान, संरचनात्मक परिवर्तन और वैश्विक सशक्तिकरण के गवाह रहे हैं।

जनकल्याण की योजनाएँ: शासन को सेवा में बदलने की साधना

जन-धन योजना से लेकर उज्ज्वला, आयुष्मान भारत से लेकर PM-KISAN तक : मोदी सरकार की हर योजना में वंचितों को वरीयता, अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति को प्राथमिकता का दर्शन रहा। 2014 में आरंभ हुई प्रधानमंत्री जन-धन योजना ने भारत को वित्तीय समावेशन में विश्वगुरु बनाया। करोड़ों गरीबों को बैंकिंग से जोड़कर ‘जमीन से जुड़े शासन’ की मिसाल कायम की गई।

स्वच्छ भारत अभियान ने देश में एक नई नागरिक चेतना का संचार किया। यह पहली बार था जब स्वच्छता को केवल सरकार नहीं, बल्कि जनांदोलन बनाया गया।

महिला सशक्तिकरण और ग्रामीण उत्थान: आत्मबल का निर्माण: 

बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ, प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना, मुद्रा योजना, स्टैंड अप इंडिया — ये योजनाएँ नारी को केवल उपभोगकर्ता नहीं, बल्कि निर्माता, नेतृत्वकर्ता और नवाचारकर्ता के रूप में प्रतिष्ठित करती हैं। उज्ज्वला से जहां करोड़ों माताओं को धुएँ से मुक्ति मिली, वहीं मुद्रा योजना से महिला उद्यमिता को नई उड़ान मिली।

किसान और श्रमिकों के लिए समर्पित दशक

किसानों के हित में PM-KISAN, फसल बीमा योजना, किसान रेल, कृषि उड़ान जैसे अभिनव प्रयोग हुए। वहीं श्रमयोगी मानधन योजना, अटल पेंशन योजना, और सामाजिक सुरक्षा बीमा योजनाओं ने असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को सम्मान और सुरक्षा दी।

कोविड काल में प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना ने 81 करोड़ से अधिक नागरिकों को भोजन की गारंटी दी — यह सरकार की संवेदनशीलता की जीवंत मिसाल थी।

शिक्षा, स्वास्थ्य और तकनीकी बुनियाद का पुनर्निर्माण

2014 से 2025 तक शिक्षा क्षेत्र में भी अभूतपूर्व क्रांति हुई। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 केवल पाठ्यक्रम परिवर्तन नहीं, बल्कि संस्कृति-आधारित, मातृभाषा आधारित, कौशल उन्मुख शिक्षा क्रांति है।

आयुष्मान भारत योजना दुनिया की सबसे बड़ी सार्वजनिक स्वास्थ्य बीमा योजना बनकर उभरी। 5 लाख तक की स्वास्थ्य सुविधा ने गरीबों को उपचार का अधिकार दिलाया।

डिजिटल इंडिया मिशन, CSC नेटवर्क, डिजीलॉकर, UPI जैसे नवाचारों ने शासन को डिजिटल, पारदर्शी और त्वरित बना दिया।

आत्मनिर्भर भारत: रक्षा से लेकर रेलवे तक

2014–2025 का कालखंड भारत के रक्षा आत्मनिर्भरता का भी युग है। INS विक्रांत, तेजस, ब्रह्मोस, प्रचंड हेलीकॉप्टर अब भारत रक्षा सामग्री आयातक नहीं, निर्यातक बनने की ओर बढ़ा है।

रेलवे में वंदे भारत एक्सप्रेस, गति शक्ति योजना, भारतमाला परियोजना सबने भारत की गति को, भौगोलिक और आर्थिक, दोनों रूपों में तीव्र किया।

संस्कृति और संप्रभुता का नवोदय

2019 में धारा 370 की समाप्ति और राम मंदिर निर्माण ये केवल राजनीतिक निर्णय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय आत्मा की पुकार थे। ये निर्णय भारत के संविधान, संस्कृति और एकता की बुनियाद को और प्रबल करने वाले साबित हुए।

एक भारत श्रेष्ठ भारत, हर घर तिरंगा अभियान, नया संसद भवन इन सबने भारत को उसकी संस्कारिक अस्मिता से जोड़ने का कार्य किया।

एक युगदृष्टा की सशक्त दृष्टि

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कार्यकाल केवल प्रशासनिक उपलब्धियों का क्रम नहीं, बल्कि भारत के आत्मस्वरूप की पुनः खोज और उसे सशक्त करने की साधना है।
उन्होंने विकास को केवल GDP और Graphs तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे गांव, गरीब, गली और गगन तक पहुँचाया।

आज जब भारत अमृत काल में प्रवेश कर रहा है, तब यह विश्वास और भी दृढ़ हो चला है कि
"यह मोदी नहीं, भारत का आत्मविश्वास बोल रहा है।"

@Dr. Raghavendra Mishra JNU 

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ग्यारह वर्ष की योजनाएँ : मोदी युग की भारतगाथा

डॉ. राघवेन्द्र मिश्र JNU (लेखक/रचनाकार)

जन-जन को बैंकों से जोड़ा, शुरू हुई जन-धन की बात,
हर हाथ में खाता पहुँचा, यही है समरसता का साथ।
ये अभूतपूर्व योजना, गरीबों की मुस्कान बनी
मोदी युग की पहली सुबह में, जन-धन से बात बनी।।

स्वच्छता की शंखध्वनि जब, उठी गाँधी के नाम,
हाथों में झाड़ू थाम चले सब, हो गया देश अभिराम।

"स्वच्छ भारत" का नारा था, वो था संकल्प महान,
हर गली, हर गाँव बसा, स्वच्छता का अभिमान।।

"मेक इन इंडिया" की लहर चली, बना निर्माण का पर्व,
विदेशी पूँजी आयी बढ़कर, स्वदेशी को दिया गर्व।
उद्योगों का संजाल रचा, रोजगारों की आयी बौछार,
नवभारत ने पाया फिर से, स्वावलंबन का उपहार।।

"बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ", जब गूँजा नारा यह पावन,
लिंगानुपात में आयी सुधार, जागे जन मन भावन।
कन्यादान और उत्तम शिक्षा, सबसे बड़ा उपहार,
नवयुग की नारी बनी अब, राष्ट्र की दिशा-प्रकाशित धार।।

मुद्रा, उज्ज्वला, अटल पेंशन जनजीवन में आये रंग,
छोटे व्यापारी, माँ और वृद्ध सबके लिए बने हैं संग।
गैस चूल्हे से निकली मुस्कान, बिना गारंटी मिला व्यापार,
अवसरों की आंधी चली है, सशक्त हुआ हर परिवार।।

डिजिटल इंडिया बना इरादा, हाथों में मोबाइल शक्ति,
हर सेवा पहुँची ऑनलाइन, जुड़ गई गाँवों में 
भक्ती।

राशन, पेंशन, बैंक, इलाज सब अब मोबाइल के पास,
एक क्लिक में बसा है अब, सारा भारत ख़ास।

फसल बीमा बनी किसान की ढाल,
प्राकृतिक विपदा में भी ना हो बेहाल।
किसान सम्मान निधि से आता छह हजार का प्यार,
मोदी ने किसानों को दी, आर्थिक आत्मनिर्भरता अपार।।

आयुष्मान भारत का दीप जला, स्वास्थ्य का लाया उजियारा,
5 लाख तक की मुफ्त चिकित्सा, बना जनहित का सहारा।
गाँव-गाँव में स्वास्थ्य केंद्र, सेवा में डटे युवा,
भारत की स्वास्थ्य क्रांति में, मोदीमय भारत हुआ।।

एक देश, एक राशन कार्ड, चला जब मजदूरों के नाम,
भूखा ना रह जाए कोई, हर कोना बने सुगम धाम।
गरीब कल्याण अन्न योजना से भर गया हर थाल,
कोरोना में भी भूख से, न लड़ा कोई बाल।।

वंदे भारत, तेज गति से भागी, बनी नवभारत की रेल,
गति शक्ति से बढ़े बुनियादी ढाँचा, पुल, सड़क, सुरंग, रेल।
सेतु भारतम, स्मार्ट सिटी, भारतमाला, सागरमाला की चाल,
देश में विकास की रेल चली, और आत्मबल बना विशाल।।

धारा 370 जब हटी, जम्मू-कश्मीर ने पाया मान,
एक संविधान, एक विधान, भारत ने पाया एक गान।
रामलला का मंदिर बना, अयोध्या हुई धन्य महान,
नव निर्माण, नव संस्कृति का, प्रारंभ हुआ नव अभियान।।

हर घर नल, हर घर जल, जल जीवन का मिला समाधान,
गाँव की बहनों ने पाई, अब पानी की निज स्वतंत्रता व पहचान।
हर घर तिरंगा लहराया, एक भारत श्रेष्ठ भारत बन गया,
संस्कृति और राष्ट्रप्रेम से, देश का रोम-रोम सज गया।।

AIIMS, IIT, नव विश्वविद्यालय, बनी शिक्षा की नई बहार,
नई शिक्षा नीति से जागी, ज्ञान की नव विचारधार।
नवोदय से लेकर डिजिटल शिक्षा, हर कोना शिक्षित हुआ,
मोदी युग में ज्ञान का दीपक, देश-देशांतर तक फैला।

अमृतकाल की ओर बढ़े हैं, भारत के नव चरण,
दशकों की दूरी तय कर दी, एक युग में गिने गगन।
हर नीति, हर योजना में, दिखा भारत का स्वाभिमान,
मोदी युग ने रचा है अब, आत्मनिर्भर राष्ट्र महान।।

योजनाएँ सभी भारत विकाश की, वह हैं युगनिर्माण के शिलालेख,
हर श्रेणी, हर समाज को छूते, बने यह राष्ट्रभक्ति के रेख।
मोदी युग का गान अमर है, विकास पथ पर भारत है,

जहाँ नीति, संकल्प और सेवा तीनों मे ही महारत।।

@Dr. Raghavendra Mishra JNU 

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 धरती आबा भगवान बिरसा मुंडा: सनातन क्रांति के दीपस्तंभ

डॉ. राघवेन्द्र मिश्र JNU (लेखक/रचनाकार)

जब जन्म हुआ अंग्रेज कांपे, वन में गूँजी वाणी,
उलिहातु की मिट्टी बोली आया सत्य प्रवाणी।
धरती–आबा, धर्म–ध्वजाधारी, तेजस्वी वरदानी,
बिरसा नाम पुकारा जग ने, बना क्रांति वाणी।।

स्वदेशी सांसों से पल–पल, बालक बना मुनि-जैसा,
मिशनरियों की छाया छोड़ी, अपनाया गीता वैसा।
धरती, जल, वन, पर्वत बोले "यह सब हमारा,
जो सिखलाए भक्ति–संघर्ष, धर्म शौर्य प्यारा।।

 बिरसाइत का धर्म दिया जो, एकेश्वर में आस्था,
न स्वर्ग की लालच में बहके, न नरक की भय व्यथा।
धरती माता, वृक्ष देवता, नदियाँ पूजन मूल,
सनातन संस्कृति का प्रहरी, बना समय का फूल।।

लोकनृत्य, झांझर, गीतों में, गूँजे समता गान,
न्याय सूर्य बन प्रकट हुए वे, मिटा अधर्म तिमिर प्राण।
साधु, योगी, नेता, क्रांतिकारी, संत भी वह,
जिसकी पदचिन्हों पर चल पथ पाए शिवत्व सह।।

उलगुलान का शंख बजाया, गरजा बनकर मेघ,
अंग्रेज़ों के तख़्त हिला दिए, बोले नवधर्म लेख।
पांच सौ के इनाम लगे थे, पकड़ो उस रणधीर को,
किंतु कहाँ बाँध पाते वे, देवत्व धारक हीर को।।

न छेड़ी जाति, न धर्म किसी का, केवल न्याय पुकारा,
भेद भाव के द्रोह जला के, समरसता है सदा हमारा।
आदिवासी, दलित, किसान हो, चाहे कोई नारी,
सबके अधिकारों का स्वर बना, क्रांति की सवारी।।

योग, उपवास, तप से साधे, शौर्य ध्यान के दीप,
गुरुकुल, आश्रम, क्रांति संस्थान, ज्ञान के जल सीप।
रांची की कारा में बुझा तन, लेकिन बुझ न सका विचार,
‘बिरसा भगवान’ बनकर गूंजे, भारत के हर द्वार।।

उनके नाम से विश्वविद्यालय, स्टेशन, पार्क, हवाई मण्डल,
उनकी स्मृति में गूँजे हर वर्ष ‘जनजातीय गौरव कमंडल’।
परिसंवाद हो या राष्ट्र धर्म हो, प्रकृति की रक्षा गाथा,
हर चिंतन में बिरसा छाएं, समरस सनातन शुभ माथा।।

हे क्रांति साधक सनातनी योद्धा, तुमको शत–शत नमन,
धरती के देव, धर्म के दीप, संस्कृति के तपस्वी जन।
आपके पदचिह्नों पर चलकर पाए दिशा भारत 
राष्ट्रधर्म, प्रकृतिपूजन, भक्ति सेवा में हो महारत।।

हे बिरसा! तू दीपस्तंभ, भारत का तेज संचार,
तेरे चरणों में वंदन कर, जागे भारत अपार।
जय धरती–आबा! जय क्रांति के भाग्य–विधाता!
जय सनातन धर्म–ध्वजाधारी, भारतमाता के दाता!!

धरती की गोद में उगा था जो वृक्ष, वो आज भी छाया देता है।
भगवान बिरसा मुंडा का नाम, युगों तक प्रेरणा देता है!

@Dr. Raghavendra Mishra JNU 

8920597559