Monday, 2 June 2025

रामविलास जी: भारतीय नव जागरण के दीपक...

(काव्य-श्रद्धांजलि)

डॉ. राघवेन्द्र मिश्र, JNU (लेखक/रचनाकार)

गांव की मिट्टी से उठे, भारत की शान बने,
दलितों की पीड़ा में, जग का ज्ञान बने।
नहीं थे मात्र नेता, एक विचारधारा थे,
संविधान के पृष्ठों में, साक्षात सहारा थे।।

वह राम के साथ, विलास के भी पार थे,
संघर्ष की ज्वालाओं में, दीपक की धार थे।
जयप्रकाश की क्रांति में जो रक्त से बोले,
वह संसद में भी जनसंघर्ष के रथ पर डोले।।

धर्म का स्वरूप उनके लिए ‘सेवा’ था,
मंदिर हो या मस्जिद सबमें ‘देवता’ था।
योग और आसन उनके लिए शासन था, 
जीवन की साधना थी, सत्य के लिए राशन था।

संस्कृति को केवल पर्व नहीं, परिवर्तन कहा,
हर पीड़ित में उन्होंने भारत का दर्शन कहा।
सभ्यता में समता खोजी, सौंदर्य में समाज,
जहाँ न हो कोई ऊँच-नीच, वही हो सच्चा राज।।

शिक्षा को उन्होंने दीपक कहा अंधकार में,
ज्ञान को बाँटा समान भाव के व्यवहार में।
हर हाथ में कलम हो, हर माथे पर तेज आशा, 
ऐसा भारत रचने का था उनका उत्तम अभिलाषा।।

जब दलित मंदिर के द्वार से रोका गया,
रामविलास ने वहाँ दीप जलाया।
जब समाज ने पीठ फेर लिया,
तब उन्होंने संविधान का सहारा दिखाया।।

न थे सिर्फ़ एक राज्यमंत्री, न केवल सांसद,
जनता के हृदय में थे कर्मशील, सच्चे साथ संग।
सत्ता उनके पास थी, पर अहंकार नहीं,
हर वर्ग को उन्होंने समझा ‘परिवार’ कहीं।।

हे! रामविलास मर गए पर दीप नहीं बुझा,
उनकी विरासत में न्याय के बीज सदा सुझा।
हर उस बालक की आँख में वह स्वप्न सजाए,
जो कहे ‘मैं भी बनूँगा राम’ अलख जगाए।।

@Dr. Raghavendra Mishra 

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भारत के चिराग जो दीपक बन चमके...

डॉ. राघवेन्द्र मिश्र, JNU(लेखक/रचनाकार)

जन्म लिया उस आँगन में, जहाँ न्याय की बात उठी,
रामविलास के तेज तले, नई मशाल फिर से जगी।
बिहार की मिट्टी में पले, सपनों की लौ में रंग भरे,
अभिनय को बीच में छोड़े, जन सेवा के पथ पर चले।।

पर अभिनय में न मिली शांति, न था वहाँ वह स्वप्न-स्वर,
जन की सेवा, धर्म बना राजनीति बन गई जीवन-वर।
2014 का जब चुनाव आया, जमुई की माटी ने पुकारा,
जनता ने नेता पहचाना, और जनसभा ने दीप उजारा।।

युवा था, पर जोश में दृढ़, सोच में था परिवर्तन,
'मोदी का हनुमान' बना, लिए विकास का नव-वंदन।
दलितों का मान बढ़ाया, युवाओं में दी एक आवाज़,
राजनीति में ओज भरा, किया समाज को भी आगाज़।।

पिता गए, पर लौ न बुझे, विरासत को थामा विश्वास से,
पारस से अलग राह चली, पर हिम्मत रही साहस से।
LJP को बाँट दिया गया, पर ध्वज वही रामविलास का,
‘रामविलास’ नाम से फिर खड़ा, चिराग बना दीप विकास का।।

2024 की फिर से रणभेरी, NDA ने जो संग बुलाया,
जमुई की माटी फिर मुस्काई, विजयी चिराग को लौटाया।
दलित, युवा, किसान का नेता, भाषण में गूंजे तेज स्वर,
जो कहे "मैं नेतृत्व लूँगा, बनकर नव भारत का क्षितिज भवर।"

वह केवल एक नेता नहीं, एक विचार की नई मशाल है,
जो दुश्मनों से ना झुका, जो युग के प्रश्नों का उत्तरकाल है।
नाम है उसका चिराग, पर कार्यों में सूरज का देश है,
आज के भारत में वह, राजनीति का नया संदेश है।।

@Dr. Raghavendra Mishra 

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गुरु गोरखनाथ: योग सम्राट की महागाथा

डॉ. राघवेन्द्र मिश्र, JNU (लेखक/रचनाकार)

त्रिकालदर्शी, योगरथी, शिव-स्वरूप महान।
गोरखनाथ कहाए जो, जागे जन के प्रान॥

हिमगिरि के तपवन से, फूटी एक पुकार,
धरती के तम को हर ले, भेजूँ योगाचार!"
शिव ने फूँका मंत्र फिरा, मच्छिंद्र में प्रान,
जन्मे शिष्य गोरख तब, बन भारत का गान॥

ना जाति बंधन, ना कुल नाम,
गोरख का हैं केवल ‘योग’ काम।
शैशव में साधक, मौनी ध्यान,
माँ की गोद, पर ब्रह्म का ज्ञान॥

गुरु मच्छिंद्र ने देखा ध्यान,
ज्योतिर्मय वह साधक जान।
बोल उठे "यह तो है ज्ञान चंदन,
शिव के ही अंश का है स्पंदन!"

दीक्षा दी "अलख निरंजन" का,
सिखलाए मार्ग हठयोग का।
श्वास, चक्र, काया का राज,
गोरख बने महायोगी आज।

"काया ही काशी है" कहकर,
उन्होंने तन को साधन माना।
ना कर्मकांड, ना यज्ञ हवन,
योगमार्ग ही परम सम्माना॥

नासिका में प्राण की लहर,
मूलाधार से सहस्रार की डगर।
कुंडलिनी जागरण का मूल,
गोरख बताएं शिव का फूल॥

"आपे गुरू, आपे चेला" –
अंधश्रद्धा से मुक्त करेला।
विद्या, मन्दिर, शास्त्र द्वार,
मन का ध्यान, यही संसार॥

जात-पांत का खंडन किया,
नारी, शूद्र सबको दिया,
समता, करुणा, ज्ञान का सिंचन,
मानव धर्म को दिया नव चिंतन॥

"गगन मंडल में झूला झूले,
तहाँ बिराजे ज्ञानी।"
ऐसे गूढ़ प्रतीक कहें,
भाषा में गोरख बानी।।

उनके शब्द न केवल पद्य,
बल्कि ब्रह्म का अनुभव अद्य।
शब्द बने जीवंत प्रकाश,
हर मन में खोलें आत्मा का आशा॥

गोरख चले गाँव-गाँव,
उजले पथ और करें ठाँव।
भाषा में बोले देश की बात,
हर दिल को जोड़े साथ-साथ॥

कहीं वे बाबा, कहीं औलिया,
कहीं सिद्ध, कहीं संत कहाए।
सनातन हिन्दू, सभी समुदाय,
गोरख को अपने गुरु बनाए।।

बारह पंथ बने प्रचारक,
नाथों के जग में दीपक।
जोगी, कंफर, अवधूता धारा,
गोरख की अमर ललकारा॥

नेपाल से लेकर कर्नाटक तक,
हिमालय से लेकर सिन्धु तट।
गोरख की बानी, उठे गूँज,
"जाग रे मानव, खुद को पूज!"

शृंगार नहीं बस लौकिक भाव,
परमात्मा से मिलन की चाह।
नारी, नयन, गगन, चाँदनी,
सब योगिक चित्त की रागिनी॥

प्रेम, विरह और आत्म मिलन,
काव्य में रचे ज्ञान के धन।
प्रतीकों में उन्होंने बाँधा,
रहस्य जहाँ शिव-शक्ति साधा॥

गोरखपुर में मठ खड़ा,
आज भी है चेतन बड़ा।
योग, साधना, देश शक्ति,
गोरख परंपरा सदा भक्ति॥

जो बोले वह कर्म बने,
जो जिए वह धर्म बने।
नाथ परंपरा उनका नाम,
जग में गूंजे "गोरख" गान॥

जय हो योगी, ब्रह्म स्वरूप,
गोरखनाथ लोक के भूप।
जिसने घन अज्ञान हटा दिया,
हर आत्मा को शिव का किया।।

भारत भूमि धन्य हुई,
जब योगी ने आँखें खोलीं।
उसके बाद से अब तक,
गूँज रही है गोरख बोली।।

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श्रीमद्भगवद्गीता: एक युद्ध शास्त्र के रूप में–

ऑपरेशन सिन्दूर के विशेष संदर्भ में

लेखक: डॉ. राघवेन्द्र मिश्र, JNU

“गीता केवल मोक्ष का मार्ग नहीं, वह वीरता, धर्म और युद्ध-कौशल का अमृत-ग्रंथ है।”

श्रीमद्भगवद्गीता को प्रायः केवल एक धार्मिक, दार्शनिक और आध्यात्मिक ग्रन्थ के रूप में देखा जाता है, किन्तु इसके भीतर निहित ‘युद्ध शास्त्र’ का स्वरूप उतना ही बलशाली और प्रेरणादायक है। यह केवल आत्मा और परमात्मा की चर्चा नहीं करती, अपितु स्पष्ट रूप से धर्म की स्थापना हेतु युद्ध करने की प्रेरणा देती है। इसका संदेश केवल उपदेश नहीं है, यह एक आह्वान है, धर्म के पक्ष में, अधर्म के विनाश के लिए संग्राम में उतरने का।

महाभारत का युद्ध और गीता का उद्घोष

महाभारत के भीषण युद्ध के आरम्भ में जब अर्जुन मोहवश अपने धनुष को त्याग देते हैं, तब भगवान श्रीकृष्ण उन्हें युद्ध के लिए प्रेरित करते हैं। यही क्षण गीता का जन्म है। यह वही गीता है, जिसमें श्रीकृष्ण कहते हैं:

“धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते।” (गीता 2.31)

“धर्म के लिए लड़ा गया युद्ध, क्षत्रिय (योद्धा) का सर्वोच्च कर्म है।”

यह श्लोक न केवल अर्जुन के लिए, बल्कि आज के भारतीय सैनिकों, सुरक्षाबलों, और राष्ट्रभक्त नागरिकों के लिए भी एक शाश्वत उद्घोष है।

ऑपरेशन सिन्दूर: गीता के युद्ध शास्त्र का साक्षात् रूप:

हाल ही में संपन्न ऑपरेशन ‘सिन्दूर’ में भारतीय सेना ने जिस प्रकार से सटीक रणनीति, अदम्य साहस और राष्ट्रनिष्ठा का प्रदर्शन किया, वह श्रीमद्भगवद्गीता की युद्ध-प्रेरणा का जीवंत उदाहरण है। यह केवल एक सैन्य कार्रवाई नहीं थी, बल्कि यह धर्म-अधर्म के बीच के संघर्ष में गीता के सिद्धांतों की पुनः पुष्टि थी।

“हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं, जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्।  तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः॥” (गीता 2.37)

“मरने पर स्वर्ग मिलेगा और जीतने पर पृथ्वी पर राज्य। इसलिए युद्ध के लिए दृढ़ संकल्प लेकर खड़े हो जाओ।”

भारतीय सैनिकों ने आतंकवाद के विरुद्ध इस युद्ध में यही संकल्प दिखाया। उनका उद्देश्य केवल शत्रु का दमन नहीं था, बल्कि राष्ट्र, धर्म, और मानवता की रक्षा भी था।

गीता के युद्ध शास्त्र के प्रमुख आयाम:

1. धर्म के लिए युद्ध का आह्वान

जब अधर्म, अन्याय और आतंक सिर उठाते हैं, तब गीता युद्ध को पाप नहीं, अपितु धर्म का अनिवार्य माध्यम मानती है।

2. रणनीति और मनोबल का संतुलन

अर्जुन जैसे महान धनुर्धर भी जब मानसिक रूप से विचलित हुए, तब श्रीकृष्ण ने उन्हें मनोवैज्ञानिक, आध्यात्मिक और रणनीतिक दृष्टिकोण से युद्ध के लिए तैयार किया। यह नेतृत्व और प्रेरणा का आदर्श है।

3. निष्काम कर्म और निर्भीकता

गीता बार-बार कहती है कि योद्धा को फल की चिंता किए बिना केवल कर्तव्यनिष्ठ होकर युद्ध करना चाहिए।

“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”(गीता 2.47)

“कर्म में तेरा अधिकार है, फल में नहीं।”

ऑपरेशन सिन्दूर: गीता की शिक्षाओं की पुनर्पुष्टि

भारत की धरती पर जब-जब आतंकवाद और विध्वंसकारी शक्तियाँ सिर उठाती हैं, तब भारतीय सेना गीता के सन्देश को आत्मसात करके रणभूमि में धर्म की स्थापना हेतु अग्रसर होती है। ऑपरेशन सिन्दूर के माध्यम से यह सिद्ध हो गया कि श्रीमद्भगवद्गीता आज भी भारत के सैनिकों की आत्मा और संकल्प का आधार है।

इस अभियान ने यह स्पष्ट कर दिया कि :

“यत्र योगेश्वर: कृष्णो, यत्र पार्थो धनुर्धर:।

तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥”(गीता 18.78)

“जहाँ श्रीकृष्ण जैसे नायक और अर्जुन जैसे योद्धा हैं, वहाँ विजय, समृद्धि और नीति सदैव रहती है।” आज भारतीय सैनिकों ने इस गीता वाणी को जीवंत कर दिया है।

वर्तमान संदर्भ में गीता की आवश्यकता:

आज भारत बाह्य शत्रुओं के साथ-साथ आंतरिक आतंक, वैचारिक प्रदूषण, और सांस्कृतिक आक्रमण से भी जूझ रहा है। ऐसे समय में गीता केवल मंदिरों और पुस्तकों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यह हर सैनिक की जेब में, हर युवा की चेतना में, और हर नीति-निर्माता के निर्णय में विद्यमान होनी चाहिए।

युद्ध शास्त्र और विश्व बंधुत्व का समन्वय है गीता: 

श्रीमद्भगवद्गीता केवल ध्यान और मोक्ष का मार्ग नहीं, यह धर्मयुद्ध, राष्ट्ररक्षा और आत्मसम्मान के लिए किया गया उद्घोष है। यह ग्रन्थ हमें समानुभूति और करुणा के साथ-साथ धर्म के लिए रणभूमि में उतरने का साहस भी देता है।

ऑपरेशन सिन्दूर इसका प्रमाण है कि जब एक सैनिक गीता से प्रेरणा लेकर युद्ध करता है, तो वह केवल शत्रु का संहार नहीं करता, बल्कि राष्ट्र की आत्मा की रक्षा भी करता है।

संपर्क:
डॉ. राघवेन्द्र मिश्र

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श्रीमद्भगवद्गीता: केवल मोक्ष नहीं, एक विराट युद्ध शास्त्र भी है...

डॉ. राघवेन्द्र मिश्र, JNU (लेखक/रचनाकार)

धर्म की रक्षा हेतु युद्ध का उद्घोष करती अमर वाणी:

भारतवर्ष की आत्मा में यदि कोई ग्रंथ समाया है, तो वह है — श्रीमद्भगवद्गीता। यद्यपि गीता को सामान्यतः एक आध्यात्मिक, दार्शनिक और मोक्षदायक ग्रंथ के रूप में देखा जाता है, परंतु यह केवल उपदेशात्मक वाणी नहीं, बल्कि यह एक युद्धशास्त्र भी है ऐसा शास्त्र जो धर्म, राष्ट्र और सत्य की रक्षा के लिए युद्ध करने की नैतिकता, योग्यता और रणनीति का मार्ग दिखाता है।

युद्धभूमि में जन्मा, युद्ध के लिए प्रेरणादायक ग्रंथ/शास्त्र

महाभारत के धर्मयुद्ध की रणभूमि कुरुक्षेत्र में जब अर्जुन मोहग्रस्त होकर अपने कर्तव्यों से विमुख हो उठे, तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें जिस दिव्य बोध का उपदेश दिया, वही श्रीमद्भगवद्गीता है। वह युद्ध मात्र एक युद्ध नहीं था; वह था धर्म और अधर्म के बीच का महासंग्राम। और गीता का संदेश है जब धर्म संकट में हो, तब युद्ध संकोच नहीं, कर्तव्य बन जाता है।

“धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते।” (गीता 2.31)

"धर्म के लिए किए गए युद्ध से श्रेष्ठ और कुछ नहीं है।"

“हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं, जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्। तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय, युद्धाय कृतनिश्चयः॥” (गीता 2.37)

"या तो मरकर स्वर्ग पाओगे या जीतकर पृथ्वी का सुख, इसलिए युद्ध के लिए दृढ़ निश्चय करो।"

गीता में छिपे युद्धशास्त्र के तत्त्व 

1. धर्म युद्ध की अवधारणा

गीता यह स्पष्ट करती है कि जब अधर्म समाज में फैल जाए, तब उसका प्रतिकार करना ही धर्म है। धर्मयुद्ध न तो क्रूरता है, न ही हिंसा — यह है न्याय के लिए शौर्य का उद्घोष

2. रणनीति, मनोबल और मनोविज्ञान

भगवान श्रीकृष्ण ने युद्ध के केवल बाह्य कौशल की नहीं, बल्कि आंतरिक तैयारी और मनोबल की भी शिक्षा दी। वे अर्जुन को मनोवैज्ञानिक स्तर पर तैयार करते हैं — यही आज की सैन्य शिक्षा का भी मूल है।

3. निष्काम कर्म और दायित्व बोध

गीता सैनिक को यह सिखाती है कि युद्ध केवल जीतने के लिए नहीं, कर्तव्य निभाने के लिए किया जाए।

“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।” (गीता 2.47)
"केवल कर्म करने में तेरा अधिकार है, फल की चिंता मत कर।"

वर्तमान भारत में गीता की सैन्य उपयोगिता

आज जब भारत आतंकवाद, विचारधारा-आधारित हिंसा और सीमावर्ती संकटों से जूझ रहा है, तब गीता का यह युद्ध शास्त्रीय स्वरूप और भी प्रासंगिक हो गया है। भारतीय सेना जब "ऑपरेशन सिन्दूर" जैसे अभियानों में दुश्मनों का विनाश करती है, तो उनके लिए प्रेरणा है — गीता की यह वाणी:

“युद्धाय कृतनिश्चयः” — "युद्ध का संकल्प करो।"

गीता: युद्ध और विश्वबंधुत्व का समन्वय

यह महत्वपूर्ण है कि गीता केवल युद्ध की बात नहीं करती, बल्कि यह धर्म-संयमित युद्ध की बात करती है। युद्ध भी वही जो आत्मा, समाज, राष्ट्र और सत्य की रक्षा के लिए हो। इसी कारण यह न केवल युद्धशास्त्र, बल्कि जीवन-दर्शन का सर्वोच्च ग्रंथ भी है।

“यत्र योगेश्वर: कृष्णो, यत्र पार्थो धनुर्धर:।
तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥”
(गीता 18.78)
"जहाँ योगेश्वर कृष्ण और धनुर्धारी अर्जुन हैं, वहाँ विजय, समृद्धि और नीति निश्चय ही है।"

गीता का युद्ध शास्त्र स्वरूप: राष्ट्र के लिए संकल्प

आज के भारत में गीता केवल भक्तों का ही नहीं, बल्कि रणबांकुरों, सैनिकों और राष्ट्ररक्षकों का ग्रंथ भी बन चुकी है। जब संस्कृति, सभ्यता और अस्तित्व पर संकट हो, तब गीता हमें प्रेरणा देती है —
"धर्मस्थापनार्थ युद्ध करो, शत्रुनाशार्थ संग्राम करो, और सत्य की विजय हेतु सन्नद्ध रहो।"

अतः सभी शिक्षण संस्थाओं और भारतीय सेनाओं एवं जनता हेतु गीता को युद्ध शास्त्र के दृष्टिकोण से पढ़ना लिखना समझना और युद्ध हेतु प्रेरित होना अनिवार्य कर देना चाहिए।

लेखक: डॉ. राघवेन्द्र मिश्र, JNU ।
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Sunday, 1 June 2025

श्रीमद्भगवद्गीता एक युद्ध शास्त्र के रूप में...

डॉ. राघवेन्द्र मिश्र, JNU(लेखक/रचनाकार)

श्रीमद्भगवद्गीता न केवल एक आध्यात्मिक ग्रन्थ है, बल्कि यह एक गूढ़ युद्ध शास्त्र भी है। यह ग्रन्थ केवल साधना, मोक्ष, और भक्ति की बातें नहीं करता, बल्कि यह हमें धर्म के लिए, राष्ट्र के लिए, और न्याय के लिए संगठित, सजग, और सक्रिय रूप से युद्ध के लिए तत्पर रहने की शिक्षा भी देता है। महाभारत का युद्ध कोई सामान्य युद्ध नहीं था, बल्कि यह धर्म और अधर्म के बीच का युद्ध था। इसी युद्धभूमि में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को युद्ध हेतु प्रेरित किया, और वहीं श्रीमद्भगवद्गीता का उदय हुआ।

श्रीमद्भगवद्गीता: युद्ध प्रेरणा का स्रोत

गीता का आरम्भ ही युद्ध से होता है, जब अर्जुन अपने सगे-संबंधियों के सामने युद्ध करने से पीछे हटता है। उस समय भगवान श्रीकृष्ण उसे याद दिलाते हैं कि यह युद्ध केवल व्यक्तिगत स्वार्थ का नहीं, बल्कि धर्म की रक्षा का माध्यम है। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि पलायन नहीं, पराक्रम ही जीवन का मार्ग है।

प्रेरणादायक श्लोक :

धर्म्याद्धि युद्धाच्छ्रेयोऽन्यत्क्षत्रियस्य न विद्यते।
(भगवद्गीता 2.31)
"धर्म के लिए किए गए युद्ध से बढ़कर कोई कार्य क्षत्रिय(भारतीय सेना) के लिए नहीं है।"

हतो वा प्राप्स्यसि स्वर्गं जित्वा वा भोक्ष्यसे महीम्।
तस्मादुत्तिष्ठ कौन्तेय युद्धाय कृतनिश्चयः॥
(भगवद्गीता 2.37)
"मरोगे तो स्वर्ग(सम्मान) मिलेगा, जीतोगे तो धरती पर राज्य मिलेगा; इसलिए हे अर्जुन(भारतीय सेना और सभी जन)! युद्ध के लिए संकल्प करके खड़े हो जाओ।"

युद्ध शास्त्र के तत्त्व गीता में:

  1. धर्म युद्ध की आवश्यकता:
    युद्ध तब आवश्यक हो जाता है जब अधर्म और आतंक विश्व समाज में व्याप्त हो। गीता हमें बताती है कि युद्ध तब पाप नहीं होता जब वह धर्म और न्याय की रक्षा हेतु लड़ा जाए।

  2. नैतिकता और रणनीति:
    गीता में युद्ध की नैतिकता, मनोबल, शौर्य और रणनीति को केंद्र में रखा गया है। अर्जुन का मनोबल गिरने पर कृष्ण उन्हें मनोवैज्ञानिक रूप से युद्ध के लिए सुदृढ़ और प्रेरित करते हैं।

  3. निष्काम कर्म:
    गीता युद्ध करते हुए फल की चिंता न करने की प्रेरणा देती है। एक योद्धा को निष्काम भाव से युद्ध करना चाहिए।

कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
(भगवद्गीता 2.47)
"स्वात्म की रक्षा और विश्व बंधुत्व कल्याण में  ही तुम्हारा(भारतीय जनता और सेना का) कर्तव्य और अधिकार । केवल कर्म(आतंक के विरुद्ध युद्ध)करने में है, फल में नहीं।" क्योंकि बहुत सारे कार्य और युद्ध, स्वात्म की रक्षा, विश्व बंधुत्व हेतु कल्याण, राष्ट्र की रक्षा, ग्रंथों और शास्त्रों की रक्षा संस्कृति, सभ्यता,  परंपरा की रक्षा तथा आने वाली पीढ़ी की रक्षा के लिए भी किया जाता है।

आधुनिक परिप्रेक्ष्य में गीता: सैन्य प्रेरणा

आज के भारत में, जहाँ देश को बाहरी और आंतरिक शत्रुओं से निरंतर संघर्ष करना पड़ता है, वहाँ श्रीमद्भगवद्गीता सैनिकों, देशभक्तों और नीतिनिर्माताओं के लिए एक अमूल्य युद्धशास्त्र है। जब भारतीय सैनिक ऑपरेशन "सिन्दूर" जैसे अभियानों में भाग लेते हैं, तब उनका प्रेरणास्त्रोत श्रीकृष्ण की वह वाणी है जो कहती है : युद्धाय कृतनिश्चयः "युद्ध का पक्का निश्चय करके खड़े हो जाओ।"

यह भारत के सैन्य बलों के लिए एक राष्ट्रीय, मानसिक, नैतिक और आध्यात्मिक संबल है।

गीता: विश्व बंधुत्व और युद्ध शास्त्र दोनों है: 

गीता न केवल युद्ध की प्रेरणा देती है, बल्कि धर्म-संयमित युद्ध की शिक्षा भी देती है। इसमें अधर्म के विरुद्ध संघर्ष के साथ-साथ सर्वात्म भाव, करुणा, और आत्मबोध की भावना भी है। यही कारण है कि यह एक समग्र जीवन-दर्शन और प्रबुद्ध युद्ध शास्त्र दोनों है।

अंतिम प्रेरक श्लोक :

यत्र योगेश्वर: कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धर:।

तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम॥ (भगवद्गीता 18.78)

"जिस राष्ट्र, संस्कृति, सभ्यता, परंपरा विश्व बंधुत्व और शास्त्रों में जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और जहाँ धनुर्धारी अर्जुन हैं, वहाँ विजय, समृद्धि और नीति सदा विद्यमान रहती है। तथा ऑपरेशन सिन्दूर का सफल होना सुनिश्चित ही है।

श्रीमद्भगवद्गीता केवल मोक्ष का मार्ग नहीं दिखाती, वह वीरता, धर्म, नीति और युद्ध कौशल का अमृत ग्रंथ है। आज जब भारत को आतंकी ताकतों, वैचारिक प्रदूषण और बौद्धिक एवं राजनैतिक आतंकी इत्यादि आंतरिक विघटन से जूझना पड़ रहा है, तब गीता हमें प्रेरणा देती है — "धर्मस्थापनार्थ युद्ध करो, शत्रुनाशार्थ संग्राम करो, और सत्य की विजय हेतु सन्नद्ध रहो।" यही गीता का युद्ध शास्त्र स्वरूप है।

@Dr. Raghavendra Mishra, JNU 

संपर्क सूत्र 

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"एकात्म मानव दर्शन: विकास और मूल्यों के समन्वय की सनातन भारतीय दृष्टि"

लेखक: डॉ. राघवेन्द्र मिश्र, JNU 
(संस्कृत भाषा, IKS , सनातन संस्कृति, दर्शन एवं राष्ट्रीय विचारधारा के विद्वान)

“हम पश्चिम के अनुकरण में नहीं, अपनी आत्मा की खोज में चलें।” – पं. दीनदयाल उपाध्याय जी 

जब आधुनिक विश्व विकास के नाम पर केवल भौतिक संसाधनों की अंधाधुंध दौड़ में संलग्न होकर पर्यावरणीय संकट, सामाजिक विषमता और नैतिक पतन की त्रासदियों से जूझ रहा है, तब भारत के चिंतन-दिग्दर्शक पंडित दीनदयाल उपाध्याय का प्रतिपादित ‘एकात्म मानव दर्शन’ वैश्विक विमर्श में एक नवीन, प्रासंगिक और आवश्यक दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है।

यह दर्शन न केवल एक राजनीतिक विचार है, न ही यह किसी पश्चिमी आर्थिक ढांचे की नकल है। यह भारतीय संस्कृति की आत्मिक अंतर्दृष्टि है जो मनुष्य को केवल एक उपभोक्ता या वर्गीय इकाई न मानकर, उसे शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा के समन्वय के रूप में देखती है – पूर्ण व्यक्ति, जो समाज, राष्ट्र और प्रकृति के साथ तादात्म्य स्थापित करता है।

एकात्म मानववाद की मूल चेतना

पंडित उपाध्याय ने पश्चिमी पूंजीवाद को स्वार्थपरक व्यक्तिवाद और समाजवाद को संघर्षशील वर्गवाद के रूप में देखा। दोनों ही दृष्टिकोणों में 'मनुष्य' का आत्मिक पक्ष उपेक्षित है। उन्होंने कहा —

"मानव केवल पेट भरने की मशीन नहीं है, उसमें आत्मा भी है, धर्म भी है, संस्कार भी हैं।"

इसीलिए एकात्म मानव दर्शन में अर्थ, काम, धर्म और मोक्ष – चारों पुरुषार्थों को जीवन के संतुलित एवं समरस लक्ष्य के रूप में स्वीकार किया गया है।

राष्ट्र : केवल भूखंड नहीं, एक जीवंत सांस्कृतिक सत्ता

एकात्म मानववाद राष्ट्र को केवल राजनैतिक सीमाओं वाला क्षेत्रफल नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक सत्ता मानता है, जिसकी आत्मा वहां के जनमानस की श्रद्धा, परंपरा और कर्तव्यबोध में निहित है।

पंडित जी के अनुसार, भारत की सांस्कृतिक एकात्मता ही उसकी असली पहचान है – जहाँ भाषिक, धार्मिक, और सामाजिक विविधताएँ एक नदी की सहायक धाराओं की भाँति एक ही महासागर में विलीन होती हैं।

सनातन संस्कृति का एकात्मवादी दृष्टिकोण:

भारतीय संस्कृति की पहली विशेषता यह है कि वह संपूर्ण जीवन का, संपूर्ण सृष्टि का संकलित विचार करती है। उसका दृष्टिकोण एकात्मवादी (Integrated) है। टुकड़े-टुकड़े में विचार करना विशेषज्ञ की दृष्टि से ठीक हो सकता है, परंतु व्यावहारिक दृष्टि से उपयुक्त नहीं।

पश्चिम की समस्या का मुख्य कारण उनका जीवन के संबंध में खंडशः विचार करना तथा फिर उन सबको थेगली लगाकर जोड़ने का प्रयत्न है। हम यह तो स्वीकार करते हैं कि जीवन में अनेकता अर्थात् विविधता है, किंतु उसके मूल में निहित एकता को खोज निकालने का हमने सदैव प्रयत्न किया है। यह प्रयत्न पूर्णतः वैज्ञानिक है। विज्ञानवेत्ता का प्रयत्न रहता है कि वह जगत में दिखने वाली अव्यवस्था में से व्यवस्था ढूँढ निकाले, उनके नियमों का पता लगाए, तदनुसार व्यवहार के नियम बनाए। रसायनशास्त्रियों ने संपूर्ण भौतिक जगत में से कुछ आधारभूत तत्व (Elements) ढूँढ निकाले और बताया कि सभी वस्तुएँ उनसे भी आगे गईं। उसने इन तत्वों के मूल में निहित शक्ति अर्थात् चेतना को ढूँढ निकाला। संपूर्ण जगत में चेतना का अस्तित्व है। दार्शनिक भी मूलतः वैज्ञानिक ही होते हैं। पश्चिम के दार्शनिक द्वैत तक पहुँचे। हीगेल ने थीसिस, एंटीथीसिस तथा सिनथीसिस का सिद्धांत रखा, जिसका आधार लेकर कार्ल मार्क्स ने अपना इतिहास और अर्थशास्त्र विश्लेषण प्रस्तुत किया। डार्विन ने 'मात्स्यन्याय' को ही जीवन का आधार माना। किंतु हमने संपूर्ण जीवन और उसकी मूलभूत एकता का दर्शन किया है। जो द्वैतवादी रहे, उन्होंने भी प्रकृति और पुरुष को एक-दूसरे का विरोधी अथवा परस्पर संघर्षशील न मानकर पूरक ही माना है। जीवन की विविधता अंतर्भूत एकता का आविष्कार है और इसलिए उनमें परस्परानुकूलता तथा परस्पर पूरकता है। बीच की एकता ही पेड़ के मूल, तना, शाखा, पत्ते, फूल और फल की विविध रूपों में प्रकट होती है। इन सबके रंग, रूप तथा कुछ-न-कुछ मात्रा में गुण में भी अंतर होता है। फिर भी उनके पास बीज के साथ के एकत्व के संबंध को हम सहज ही पहचान सकते हैं।

विकास की भारतीय अवधारणा

जब आधुनिक अर्थनीतियाँ विकास को केवल उपभोग और लाभ से आंकती हैं, तब यह दर्शन एक मौलिक प्रश्न उठाता है 

“विकास किसका और किसके लिए?”

यहां विकास का मापदंड केवल GDP या निवेश प्रवाह नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा, सामाजिक समरसता, पर्यावरणीय संतुलन और आत्मनिर्भरता है। एकात्म मानववाद स्वदेशी अर्थनीति की संकल्पना करता है जो स्थानीय संसाधनों, परंपरागत ज्ञान और सामाजिक उत्तरदायित्व पर आधारित हो।

धर्म : केवल आस्था नहीं, आचरण का आधार

धर्म को लेकर पंडित उपाध्याय ने एक अत्यंत स्पष्ट और सुसंस्कृत परिभाषा दी —
धर्म का अर्थ पंथ नहीं, बल्कि कर्तव्य, उत्तरदायित्व और संतुलन की वह नैतिक संहिता है, जो व्यक्ति, समाज और सृष्टि के बीच सामंजस्य स्थापित करती है।

इस दर्शन में धर्म, विज्ञान या राजनीति से विरोध नहीं करता; वह उन्हें दिशाबोध प्रदान करता है।

वर्तमान संदर्भ में प्रासंगिकता

आज भारत “विकास और विरासत” दोनों को साथ लेकर चलने की राह पर है — आत्मनिर्भर भारत, नई शिक्षा नीति, स्थानीय उत्पादों का संवर्धन, ग्राम स्वराज — ये सभी पहलें पंडित उपाध्याय के विचारों की छाया में खड़ी होती प्रतीत होती हैं।

आज की राजनीति में भी, सेवा, सांस्कृतिक जागरूकता और जनसामान्य के आत्मसम्मान की पुनः प्रतिष्ठा में यह दर्शन मौन प्रेरक बन रहा है।

 वैश्विक मार्गदर्शन की भारतीय दृष्टि

आज जब मानवता अपने अस्तित्व की मूलभूत शर्तों पर पुनर्विचार कर रही है, तब भारत को चाहिए कि वह अपने मूल चिंतन-स्रोतों से जुड़े और उन्हें नवस्वरूप में विश्व के सामने प्रस्तुत करे।

‘एकात्म मानव दर्शन’ न केवल भारत की आत्मा का प्रतिबिंब है, बल्कि वह एक वैश्विक वैचारिक योगदान भी है जो संतुलित विकास, सामाजिक सौहार्द और सांस्कृतिक पुनरुत्थान की प्रेरणा देता है।

आज आवश्यकता है कि शिक्षा, नीति निर्माण, प्रशासन और समाज के सभी क्षेत्रों में इस दर्शन को जीवन्त किया जाए। तभी भारत ‘विकसित राष्ट्र’ नहीं, बल्कि ‘विकासशील विश्व का नैतिक पथ-प्रदर्शक’ बन पाएगा।

लेखक परिचय:
डॉ. राघवेंद्र मिश्र
(लेखक: डॉ. राघवेन्द्र मिश्र, JNU 
(संस्कृत भाषा, IKS , सनातन संस्कृति, दर्शन एवं राष्ट्रीय विचारधारा के विद्वान) अकादमिक, सामाजिक, राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय विषयों पर सक्रिय टिप्पणीकार)

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