Friday, 6 June 2025

कश्मीर शैव दर्शन: आचार्य अभिनवगुप्त की परंपरा में सनातन भारत का चैतन्य दर्शन

डॉ. राघवेन्द्र मिश्र, JNU (लेखक/रचनाकार)


न चित्तं न च मेयं वा न चिन्ता न च चिन्तकः।

चिदेवाद्वयविस्तीर्णं तत्काश्मीरशिवं भजे॥”
(तन्त्रालोक – अभिनवगुप्त)

कश्मीर की बर्फीली चोटियों में जितनी स्थिरता है, उतनी ही गहराई वहाँ की दर्शन परंपरा में है। हिमालय की गोद में बसा कश्मीर केवल भौगोलिक सौंदर्य का प्रतीक नहीं, अपितु भारतीय चैतन्य परंपरा का तीर्थ है। इस परंपरा के श्रेष्ठतम प्रतिनिधि हैं – आचार्य अभिनवगुप्त (9 वीं से10वीं सदी), जिनके द्वारा प्रतिपादित कश्मीर शैव दर्शन आज भी भारत की आत्मा का सनातन दार्शनिक स्वरूप है।

आचार्य अभिनव गुप्त के द्वारा प्रतिपादित कश्मीर शैव दर्शन की आत्मा: शिव और शक्ति का अद्वैत रूप

कश्मीर शैव दर्शन, विशेषतः त्रिक शैववाद में, शिव केवल एक देवता नहीं, बल्कि पूर्ण चैतन्य हैं सर्वत्र व्याप्त, अनित्य रहित, और साक्षात अनुभवयोग्य। यह दर्शन कहता है: “चैतन्यमात्मा शिवोऽहं”(तन्त्रसार) अर्थात, मैं ही चैतन्य स्वरूप शिव हूँ।

यह विचार वेदांत की निर्गुणता और तंत्र की सगुणता का समन्वय करता है। इसमें न तो संसार से पलायन है, न ही भोग में डूबने की छूट; बल्कि यह जीवन को योग, कला और साधना का उत्सव मानता है।

दर्शन, तंत्र और सौंदर्यशास्त्र के त्रिवेणी आचार्य: अभिनवगुप्त

आचार्य अभिनवगुप्त केवल एक दार्शनिक नहीं, बल्कि योगी, तांत्रिक, कवि, संगीतज्ञ, नाट्यशास्त्राचार्य और राष्ट्रचिंतक थे। उन्होंने 40 से अधिक ग्रंथों की रचना की, जिनमें प्रमुख हैं:

  • तन्त्रालोक – कश्मीर शैव दर्शन का बड़ा ग्रंथ (5867 श्लोक)
  • अभिनवभारती – भरतमुनि के नाट्यशास्त्र पर विश्वप्रसिद्ध टीका
  • परात्रिंशिका-विवरण, ईश्वरप्रत्यभिज्ञा-विमर्शिनी, आदि

उनके विचारों में रस, शिव और शक्ति  ये तीनों अनुभव के स्तर पर एकमेक हो जाते हैं।

“रसस्वादनमेव ब्रह्मस्वादनं (अभिनवभारती) कला में रस का अनुभव ईश्वर की अनुभूति है।

संस्कृति, धर्म और राष्ट्र: एकात्म दृष्टि

आचार्य अभिनवगुप्त ने दर्शन को केवल शास्त्रों में सीमित नहीं रखा, अपितु उसे जीवन और राष्ट्रचिंतन में भी रूपांतरित किया। वे मानते थे कि: “आत्मस्वरूपविज्ञानं राष्ट्रस्य मूलं भवति।” आत्मबोध ही राष्ट्र की नींव है।

उन्होंने कश्मीर को भारतीय संस्कृति का उत्तरध्रुव माना, जहाँ मंदिर केवल पूजा स्थल नहीं, बल्कि चैतन्य जागरण केंद्र थे। उनका मत था कि ज्ञान, कला और योग से राष्ट्र पुनः जागृत हो सकता है।

योग, भक्ति और साधना: तंत्र के आलोक में

कश्मीर शैव परंपरा का योग केवल आसन नहीं, बल्कि ‘चित्त की शिवत्व में स्थिति’ है। इसमें शक्तिपात, ज्ञानयोग, भावना योग, और स्वातंत्र्य अनुभव को साधना के अंग माना गया। “स्वातन्त्र्यादेव सर्वं सृष्टम्”(तन्त्रालोक) शिव की स्वतंत्र चेतना से ही सृष्टि की रचना हुई है। यह दर्शन भक्ति को केवल भावुकता नहीं, बल्कि बोधयुक्त समर्पण मानता है, जिसमें शिव और जीव का भेद मिट जाता है।

कश्मीर से अखंड भारत का: एक शाश्वत सांस्कृतिक गंगा प्रवाह:

आचार्य अभिनवगुप्त का चिंतन केवल कश्मीर तक सीमित नहीं। उन्होंने भारत के प्रत्येक भाग में फैले शैव, वैदिक, शाक्त, और तांत्रिक परंपराओं को समेटकर एक सनातन सांस्कृतिक शाश्वत एकता का दर्शन प्रस्तुत किया।

उनकी दृष्टि में भारत केवल भूभाग नहीं, बल्कि चैतन्य सनातन भारत है, जो धर्म, ज्ञान, योग और सौंदर्य में स्थित है।

वर्तमान युग की आवश्यकता: आचार्य अभिनवगुप्त की प्राणी कल्याण, जीव कल्याण और मानव कल्याण के लिए पुनःप्रस्तुति:

आज जब कश्मीर को उसके वैदिक और शैव मूल से काटने के प्रयास हो रहे हैं, तब आचार्य अभिनवगुप्त की स्मृति राष्ट्र के सांस्कृतिक पुनरुत्थान की कुञ्जी बन सकती है। हमें विद्यालयों, विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों में कश्मीर शैव दर्शन, तन्त्रालोक, नाट्यशास्त्र और रस सिद्धान्त को पुनः प्रतिष्ठित करना चाहिए।

आचार्य अभिनवगुप्त का कश्मीर शैव दर्शन अखंड सनातन भारत की जीवंत चेतना, आध्यात्मिक स्वतन्त्रता और कला के आध्यात्मिक मूल्यों का अद्वितीय संगम है। यह केवल दर्शन नहीं, एक जीवन-दर्शन है जो आज भी भारत के लिए उतना ही प्रासंगिक है, जितना सहस्त्र वर्ष पूर्व था।

नाहं मनुष्यो न च देव यक्षः। 

किन्तु स्वयं ज्ञानमयोऽहमात्मा॥ (ईश्वरप्रत्यभिज्ञा)

मैं न मानव हूँ, न देवता; मैं स्वयं प्रकाशस्वरूप आत्मा हूँ।


डॉ. राघवेन्द्र मिश्र, JNU.

मोबाइल नंबर: 8920597559

(काशी विद्वत परिषद के सदस्य एवं भारतीय दर्शन, संस्कृत, नाट्यशास्त्र और कश्मीर शैव दर्शन के विद्वान। राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (NSD), दिल्ली में विजिटिंग फैकल्टी एवं भारतीय ज्ञान परंपरा के लेखक)।

Thursday, 5 June 2025

योगी आदित्यनाथ सनातन धारा के वाहक(कविता)

डॉ. राघवेन्द्र मिश्र, JNU (लेखक/रचनाकार)

गोरक्षपीठ का दीप जले, योगी बनें जो यशगान,
नाथ परंपरा जाग उठी, उठा पुनः हिंदुस्थान।
राष्ट्रधर्म के ध्वज को लेकर, चले तपस्वी वीर,
भक्ति, योग, सेवा समन्वय, बने जीवन का तीर।।

शिव-सूत्र का भाव लिया, गह लिया योग का मूल,
गोरखनाथ के पदचिन्हों पर, बढ़ा शौर्य का शूल।
वेद पुराणों की छाया में, वह राजपथ पर चला,
सिंहस्वरूप मुनि-ध्यानयुक्त, धर्म राष्ट्र का भला।।

हिंदू होना सरल नहीं है, संस्कृति की भाषा है,
मंदिर, व्रत, संस्कारों में, भारत की परिभाष है।
रामराज्य का स्वप्न लिए, सेवा में दिन रैन,
कान्हा की नगरी संवारी, पुनः चमका काशी चैन।।

न सत्ता का लोभ उन्हें, ना इच्छाओं का जाल,
जन-जन के कल्याण हेतु, कर्म बने सुरताल।
गायत्री, गीता, गोरक्षा तीनों उनके मर्म,
नारी, किसान, बालक सबका, करें सेवा धर्म।।

योग साधना, संयम साधन, नाथों की परिपाटी,
गोरखनाथ की वाणी बनकर, जागे सुधर्म हाथी।
ना कोई जात पात रहा, ना ही संकीर्ण दृष्टि,
एकात्म मानववाद बना, शासन की प्रवृत्ति।।

संस्कृति की थाती को ले, पाठशालाएँ खोल,
वेद विज्ञान समन्वय कर, बढ़े भारत का मोल।
अंत्योदय से आरंभ करे, नित्य धर्म का ज्ञान,
जनसेवा ही मंत्र रहा, योगी का अभियान।।

धर्म न पूजा भर रहे, धर्म बने कर्तव्य,
राम, कृष्ण, शिव सबमें छिपा, राष्ट्रप्रेम का सर्वस्व।
प्रेम, साहस, त्याग लिए, जो करता हित देश,
योगी उसका नाम है, जो करता जनप्रवेश।।

काशी दीपों से दमकी, अयोध्या में शुभ घड़ी,
माथे पर गंगाजल चढ़ा, गौरवशाली कड़ी।
जहाँ जहाँ छाया अंधियारा, पहुँची वहाँ मशाल,
योगी जैसे साधक से, जागा राष्ट्र विशाल।

योग, यज्ञ और राष्ट्रधर्म,
बने जिनका सहज स्वभाव।
योगी वही जो स्वयं तपा,
औरों को दे प्रकाश नाव।।

नाथों की परंपरा जीवित,
रामकाज में लगे हुए।
ऐसे योगी आदित्यनाथ,
भारत भाग्य जगे हुए।।

@Dr. Raghavendra Mishra JNU 

गुरुजी गोलवरकर के सनातन विचार(कविता)

डॉ. राघवेन्द्र मिश्र, JNU (लेखक/रचनाकार)

वह ज्योति पुञ्ज थे भारत के,
संघध्वनि में जिसका आह्वान होवे।
धरा चिंतक, संस्कृति के पूजक 
गुरुजी का जीवन ही आदर्श होवे।।

न सियासत, न तख़्त की चाह,
था एकात्म का सत्य संदेश।
धर्म, राष्ट्र, समाज, अध्यात्म,
संग-संग चला एक परम प्रवेश।।

हिंदू न कोई मज़हब मात्र,
यह तो जीवन की धारा है।
भू, पूर्वज, भाषा, विश्वास,
सबमें सनातन प्यारा है।।

संस्कृति जिसकी श्वास बनी,
संघ जहाँ से दिशा पाए।
विद्या जहाँ चरित्र बने,
वह शिक्षा गुरुजी सिखलाए।।

राम बने कर्म के प्रतीक,
कृष्ण बने नीति के सार।
योग, तप, सेवा, समर्पण,
गुरुजी का जीवन था अपार।।

“राष्ट्र सेवा ही ईश्वर सेवा”,
हर शाखा में प्रतिध्वनित हो।
गाँव-गाँव, नर-नारी जागें,
यह यज्ञ कभी न कक्षणितु हो।।

मंदिर केवल ईंट न पत्थर,
वह संस्कृति की साँस बने।
व्रत, पर्व, परंपरा-सेतु,
जन से जन का सदा साथ घने।।

न भूले हम नेशनहुड,
न छूटे बंच आफ थाट।
हिंदुस्थान की आत्मा बोले,
गुरुजी के वे अनुपम बात।।

आज जब भारत चेतन बना,
और विश्व में जयघोष उठा।
तो गुरुजी की वाणी बोले,
शाश्वत सनातन सदा टिका।।

गुरुजी थे संस्कृति के प्रहरी,
राष्ट्रबोध के दीप हमारे।
आज भी पथ उन्हीं का सुंदर,
कल के दीपक, आज के तारे।

गुरुजी के सनातन विचार केवल अतीत नहीं,
बल्कि सनातन भारत के भविष्य का निर्माण हैं।

डॉ. राघवेंद्र मिश्र, JNU (लेखक/रचनाकार)

8920597559

@Dr. Raghavendra Mishra, JNU 

गुरु माधवराव गोलवलकर जी सनातन एकात्म मानव जीवन-दर्शन के विचारक के रूप में:

डॉ. राघवेन्द्र मिश्र, JNU (लेखक/रचनाकार)

वर्तमान भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण में यदि किसी एक व्यक्तित्व का सर्वाधिक योगदान रहा है, तो वह हैं गुरु जी माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर, जिन्हें स्नेहपूर्वक ‘श्री गुरुजी’ कहा जाता है। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के द्वितीय सरसंघचालक होने के साथ-साथ एक राष्ट्र द्रष्टा, दार्शनिक, और राष्ट्रऋषि भी थे, जिनके विचारों ने सम्पूर्ण भारत के युवाओं, चिंतकों और समाजसेवकों को दिशा प्रदान किया। गुरुजी का जीवन-दर्शन भारतीय संस्कृति की आत्मा से अनुप्राणित था। वे भारत को केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक सत्ता मानते थे। उनके विचारों में धर्म, राष्ट्र, समाज, और अध्यात्म ये सब पृथक-पृथक नहीं, बल्कि एकात्म रूप में समाहित थे।

सनातन हिंदुत्व: एक समग्र सांस्कृतिक दृष्टि

श्री गुरुजी ने 'हिंदुत्व' को संकीर्ण धार्मिक पहचान से कहीं ऊपर उठाकर एक जीवनशैली, परंपरा और मूल्य-व्यवस्था के रूप में परिभाषित किया। उनके अनुसार, "हिंदू कोई पंथ नहीं, बल्कि इस देश की भूमि, पूर्वजों, संस्कृति और जीवन-मूल्यों से निष्ठा रखने वाला प्रत्येक व्यक्ति है।"

सनातन शिक्षा और संस्कृति: चरित्र निर्माण का आधार–

गुरुजी आधुनिक शिक्षा प्रणाली के ‘पश्चिमीकरण’ पर चिंता व्यक्त करते थे। उनका मानना था कि शिक्षा का लक्ष्य केवल नौकरी या तकनीकी दक्षता नहीं, बल्कि चरित्र, आत्मबल और राष्ट्रनिष्ठा का निर्माण होना चाहिए। उन्हीं की प्रेरणा से संघ से जुड़ी विद्याभारती, भारतीय शिक्षा मंडल जैसी संस्थाएं पनपीं।

अध्यात्म और राष्ट्रधर्म:

गुरुजी ने अध्यात्म को केवल मोक्ष या आत्मकल्याण का साधन नहीं, बल्कि राष्ट्रनिर्माण का नैतिक आधार माना। वे श्रीराम और श्रीकृष्ण को केवल पूज्य देवता नहीं, बल्कि आदर्श कर्मयोगी और राष्ट्रपुरुष मानते थे। उनके जीवन से उन्होंने कर्म, भक्ति और सेवा का प्रेरणा-स्रोत लिया।

सनातन जनसेवा ही ईश्वर सेवा:

श्री गुरुजी का मूल मंत्र था “राष्ट्र सेवा ही ईश्वर सेवा है।” उनके जीवनकाल में संघ की शाखाएँ गाँव-गाँव तक पहुँचीं, और उन्होंने लाखों स्वयंसेवकों को निःस्वार्थ सेवा, सामाजिक समरसता, और जाति-विभेद से मुक्त भारत के निर्माण हेतु प्रेरित किया।

सनातन वैचारिक धरोहर:

उनकी पुस्तकें जैसे “We or Our Nationhood Defined” और “Bunch of Thoughts” आज भी लाखों राष्ट्रप्रेमियों के लिए चिंतन के स्तंभ हैं। इनमें उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत की एकता केवल संविधानिक व्यवस्था से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक समरसता और धार्मिक सहिष्णुता से टिकाऊ बन सकती है।

 मंदिर, परंपरा और समाज:

गुरुजी के अनुसार मंदिर केवल पूजा का स्थल नहीं, बल्कि सामाजिक जीवन की धुरी है जहाँ व्यक्ति अपने अस्तित्व से ऊपर उठकर समाज के साथ जुड़ता है। उनकी दृष्टि में मंदिर, पर्व, व्रत, सभी भारतीय समाज की सांस्कृतिक कड़ियाँ हैं।

श्री गुरुजी माधवराव गोलवलकर केवल संघ के नेतृत्वकर्ता नहीं थे, वे भारत के सांस्कृतिक आत्मबोध के जाग्रतक थे। उनका समर्पित जीवन हमें यह सिखाता है कि राष्ट्रनिर्माण का मार्ग केवल राजनीति से नहीं, बल्कि संस्कृति, सेवा, और अध्यात्म से होकर जाता है। आज जब भारत वैश्विक मंच पर आत्मनिर्भर और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की ओर उन्नत हो रहा है, तब गुरुजी की एकात्म दृष्टि और मूल्याधारित नेतृत्व हमारे लिए प्रेरणा का शाश्वत स्रोत है।

“गुरुजी के विचार केवल अतीत नहीं, वर्तमान और भविष्य की भी राह दिखाते हैं।”

@Dr. Raghavendra Mishra JNU 

8920597559

Tuesday, 3 June 2025

सनातन संस्कृति का प्रकृति पथ...

डॉ. राघवेन्द्र मिश्र, JNU (लेखक/रचनाकार)

मातर्भूमिः पुत्रोऽहम् का, अनहद नाद है चेतन का।
पृथ्वी को माँ माना जिसने, वह पंथ सनातन जीवन का।।
न माटी केवल संसाधन है, न वन खनिज का भंडार है,
यह चेतनता का विस्तार है, यह ऋषियों का उपकार है।।

धरती, जल, अग्नि, पवन, गगन पाँच तत्व ही ब्रह्म रूप,
इनमें ही देखा ब्रह्मांड, इनसे ही चलता जग स्वरूप।
अग्निमीळे पुरोहितं की ऋचा, आपो हिष्ठा मयोभुवाः,
सनातन की संकल्पना में, हर अणु है एक हुआ।।

वृक्ष न केवल छाया देते, ये पुण्य के भी आधार हैं,
"दशपुत्रो समो द्रुमः" यह तो स्वयं पुराणों का सार है।
जन्मोत्सव पर वट वृक्ष लगाएँ, विवाह दिवस हो पीपल दान,
एक वृक्ष से लाखों जीवन यही है सनातन की पहचान।।

गौ, नाग, वानर, गरुड़, सब पूजे गए देव समान,
मनु कहते "अहिंसा धर्मः" यही सनातन का प्रधान।
ना हिंसा, ना शोषण, ना छल, जीव मात्र में आत्मा की झलक,
सह अस्तित्व का यह आधार बना प्रकृति के प्रति शुभ ललक।।

गंगा, यमुना, सरस्वती नदियाँ हैं केवल नहीं धाराएँ,
यह तो हैं माँ के स्वरूप जीवन देती अमृत धारा लाएँ।
"गङ्गे यमुने शुद्धयन्तु नः" यह तो प्रार्थना है जल के प्रति,
लेकिन आज इन्हें बनाया केवल नाला और उद्योग की गति।।

भूमिपूजन में माटी की पूजा, यज्ञों में वायु की आरती,
तर्पण में जल की वंदना, हवन में वृष्टि की होती शुभ गति।
हर संस्कार में पर्यावरण जैसे प्राण में प्राण भर जाए,
सनातन धर्म की यह परंपरा जीवन को स्थायी स्वर दे पाए।।

जब दुनिया खोज रही समाधान संकटों में जकड़ा जीवन,
तब सनातन देता शिक्षा प्रकृति से प्रेम है मूल प्रयोजन।
SDGs हों या जलवायु संकट, उत्तर हर काल में एक ही है,
“धर्म: संरक्षणाय प्रकृते:” यही सनातन की गाथा सटीक है।।

आओ लौट चलें उन ग्रंथों की ओर, जहाँ वनों में ऋषियों का वास था,
जहाँ नदी भी देवी मानी गई, और वायु भी प्राण का विश्वास था।
यदि जागेगा फिर से यह भाव, तो पृथ्वी बनेगी स्वर्ग समान,
और विश्व बनेगा सनातनधर्मी प्रकृति के प्रति कृतज्ञ महान।।

@Dr. Raghavendra Mishra

8920597559


(संस्कृत, दर्शन, और भारतीय ज्ञान परंपरा के विद्वान)
JNU, नई दिल्ली


सनातन संस्कृति में पर्यावरण संरक्षण और संवर्धन की वैदिक, समन्वयपरक और सार्वकालिक जागृत चेतना 

डॉ. राघवेन्द्र मिश्र, JNU (लेखक/रचनाकार)

मातर्भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्याः अथर्ववेद का यह उद्घोष केवल एक मंत्र नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक चेतना का दर्पण है जिसने प्रकृति को न केवल पूज्य माना, बल्कि उसे जीवन का अविभाज्य अंग स्वीकार किया। आज जब संपूर्ण विश्व जलवायु संकट, जैव विविधता ह्रास और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन से जूझ रहा है, तब यह आवश्यक हो जाता है कि हम अपनी सनातन संस्कृति की उन मूल अवधारणाओं की ओर लौटें, जिनमें पर्यावरण संरक्षण को न केवल धर्म, बल्कि जीवन का अभिन्न कर्तव्य माना गया।

पंचमहाभूतों में परमात्मा रूपी प्रकृति का दर्शन:

सनातन परंपरा में सृष्टि के मूल तत्त्व पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश को दैवत्व प्रदान किया गया। यह दर्शन भौतिकता के पार जाकर पर्यावरण को चेतन सत्ता के रूप में देखता है। ऋग्वेद में अग्नि को यज्ञ का देवता कहा गया है – "अग्निमीळे पुरोहितं", वहीं यजुर्वेद में जल को जीवनदायक और सुखप्रद घोषित किया गया"आपो हि ष्ठा मयोभुवाः"

भूमि, जिसे ‘माता’ कहा गया, उसके साथ पुत्रवत् संबंध की भावना आज के भौतिकतावादी भूमि उपयोग की प्रवृत्ति के विपरीत एक संतुलित उपयोग की शिक्षा देती है।

वृक्ष और वनस्पति: जीवन के शाश्वत स्तंभ:

सनातन धर्म में वृक्षों को केवल जीवनदायी नहीं, बल्कि देवस्वरूप माना गया। पद्मपुराण में वृक्षों की महिमा इस प्रकार वर्णित है –
"दशकूपसमावापी... दशपुत्रो समो द्रुमः स्मृतः"
अर्थात् एक वृक्ष लगाना दस पुत्रों के समान पुण्यदायक है। आज जबकि वनों की कटाई और जैव विविधता की हानि गंभीर चिंता का विषय है, उस परिस्थिति में सनातन परंपरा का यह वृक्ष-पूजन विश्व को एक स्थायी समाधान दे सकता है। यदि विश्व के सभी व्यक्ति अपने जन्मदिवस, विवाह, विभिन्न उत्सवों के उपलक्ष्य में केवल प्रतिवर्ष एक–एक वृक्ष लगाए तो पर्यावरण से संबंधित अधिकांश समस्याओं का समाधान हो जाएं।

पशु-पक्षियों से सह-अस्तित्व की समरस भावना:

सनातन संस्कृति किसी भी जीवधारी के प्रति हिंसा को अधर्म मानती है। मनुस्मृति में कहा गया –
"अहिंसा सर्वभूतानां धर्मं श्रेठ्ठतमं विदुः"
अर्थात् समस्त प्राणियों के प्रति अहिंसा ही श्रेष्ठ धर्म है।

गाय, नाग, गरुड़, वानर जैसे जीवों को देवी-देवताओं से जोड़कर उनकी रक्षा सुनिश्चित की गई। आज के संदर्भ में यह दृष्टिकोण जैव विविधता संरक्षण की नींव है।

नदियों, पर्वतों और जलस्रोतों की शाश्वत पवित्रता:

गंगा, यमुना, सरस्वती जैसी नदियाँ केवल जलधाराएँ नहीं, बल्कि जीवित देवियाँ मानी जाती हैं। ऋग्वेद कहता है –
"गङ्गे यमुने सरस्वति... शुद्धयन्तु नः",
अर्थात ये नदियाँ हमें शुद्ध करें।

प्रकृति की इस पवित्र दृष्टि ने गंगा को गटर बनने से रोका, किन्तु आधुनिकता के नाम पर हमने इन जीवनदायिनी जलधाराओं को प्रदूषण का पात्र बना डाला।

सनातन संस्कारों में पर्यावरण चेतना:

सनातन धर्म के विविध संस्कार, जैसे भूमिपूजन, हवन-यज्ञ, तर्पण, आदि के पीछे स्पष्ट पर्यावरणीय उद्देश्य निहित हैं। यज्ञों द्वारा वायुमंडल की शुद्धि, भूमि पूजन द्वारा भूमि के प्रति कृतज्ञता, और तर्पण से जल स्रोतों का आदर यह सब आधुनिक "सस्टेनेबिलिटी" का प्राचीन रूप है।

सनातन पर्यावरण संरक्षण और संवर्धन का वर्तमान परिप्रेक्ष्य में प्रासंगिकता:

आज जब वैश्विक समुदाय संयुक्त राष्ट्र के टिकाऊ विकास लक्ष्यों (SDGs) की ओर देख रहा है, तब हमें यह स्मरण करना चाहिए कि सनातन संस्कृति में पर्यावरण के संरक्षण और संवर्धन की सोच सहस्त्रों वर्षों से जीवन का अंग रही है। यह दृष्टिकोण केवल भारत के लिए ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिए मार्गदर्शक बन सकता है।

संक्षेप में कहें तो सनातन संस्कृति प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की संस्कृति है। यहाँ पर्यावरण संरक्षण कोई अधुनातन विचार नहीं, बल्कि ‘धर्म’ का स्वरूप है। हमें केवल अपने ग्रंथों की ओर लौटने की आवश्यकता है, जहां ऋग्वेद से लेकर उपनिषदों, स्मृतियों और पुराणों तक हर स्थान पर प्रकृति के प्रति श्रद्धा और संरक्षण का संकल्प रचा-बसा है।

आज आवश्यकता है इस चेतना को पुनः जागृत कर उसे नीति, शिक्षा और व्यवहार का अंग बनाया जाए। सम्पूर्ण विश्व में सनातन विकास की अर्थव्यवस्था को लागू किया जाए, जिससे विश्व का पर्यावरण संरक्षण और संवर्धन हो सके। तथा संपूर्ण विश्व में सनातन प्राणिदर्शन, सनातन जीवदर्शन और सनातन मानवदर्शन समरस भाव से स्थापित हो सके। तभी हम आने वाली पीढ़ियों को एक समृद्ध, संतुलित और सुरक्षित पर्यावरण और स्वास्थ्यपरक जीवन दे सकेंगे।

@Dr. Raghavendra Mishra, JNU 


Monday, 2 June 2025

गरीब और वंचितों के दीपक: रामविलास जी...

(एक समग्र काव्य-पुंज: कविता)

डॉ. राघवेन्द्र मिश्र, JNU (लेखक/रचनाकार)

खगड़िया की मिट्टी में, उगा एक तेजस्वी फूल,
दलितों की आँखों में, बनकर आया संकल्प मूल।
नाम मिला 'रामविलास', पर जीवन था लोकविलास,
हर हृदय की वेदना को, समझे जैसे भाव-प्रकाश।।

ना कोई सिंहासन, ना कोई कुलीन गाथा,
पर उनकी नज़र में था, भारत से असली नाता।
जिनको न इतिहास ने गिना, वह उनके गीत बने,
भीमराव के स्वप्नों को, साकार सजीव बने।।

जाति नहीं जन्म से, कर्म से मानव होता है,
जहाँ समता हो जीवन में, वहीं धर्म सजता है।
न्याय जहाँ भोजन जैसा, सम्मान हो हर घर में,
ऐसा दर्शन रामविलास ने देखा सभी अक्षर में।।

ना केवल पर्व, ना केवल रीत,
संस्कृति है जहाँ मिले सबको प्रीत।
नाट्य नहीं यदि दलित नाचे नहीं,
गीत नहीं यदि पीड़ित गाए नहीं।
संस्कृति वही जो सबका हो भाग,
जिसमें हो समरसता का अनुराग।।

संस्कृति वही जो बंदिशें तोड़े,
नवचेतना की नयी राह मोड़े।
सौंदर्य वही जहाँ अश्रु भी चमके,
जहाँ श्रमशील कर्मठ हाथ दमके।
वे कहते "रूप नहीं रंग का मोल,
सत्य का तेज है सुंदरता का गोल।।"

काग़ज़-कलम से ही तो बदले विचार,
वह शिक्षा सही, जो सबको दे प्यार।
हर बालक को दो ज्ञान की मशाल,
ताकि अंधकार में भी दिखे उसे चाल।
गाँव-गाँव में स्कूल उत्तम चले,
नारी हो या दलित सबका भविष्य फले।।

योग नहीं केवल देह का मोल,
यह तो है आत्मा का मूल अनमोल।
रामविलास ने योग को कहा,
"यह संयम है, भीतर को तोल।"
ध्यान था उनका कर्म,
और भक्ति जनसेवा धर्म।।

मंदिर के द्वार जब बंद मिले,
उन्होंने आह्वान किया “ताले खुलें!”
ईश्वर न जात पूछे, न वंश,
हर प्राणी में बसता है उसका अंश।
भक्ति वही जो बंधन तोड़े,
हर मानव को भगवन से जोड़े।।

राजनीति नहीं था उनके लिए सिंहासन,
यह है एक यज्ञ, जनसेवा का आसन।
रेलमंत्री हों या मंत्री उपभोक्ता,
हर पद पे किया समाज का सुनियोक्ता।
दलितों के हक़ की बनी आवाज़,
लोक जनशक्ति में था संघर्ष का राज।।

"ना केवल आरक्षण, चाहिए सम्मान भी,"
हर ग़रीब को मिले समान स्थान भी।
कुरीतियों से लड़े, व्यथा से भिड़े,
सत्ता में रहते हुए भी सत्य से जिए।
उनके जीवन में छिपा वह गीत,
जो गूंजेगा युगों तक संप्रीत।।

अब भले वो न हों इस धरा पर,
पर विचार हैं हर पथ, हर घर।
रामविलास वो दीप हैं, जो बुझे नहीं,
हर अंधेरे को वो आलोक से छुए सही।
पीढ़ियाँ उठें नयी उनके नाम से
समानता का झंडा ऊंचा हो शान से।।

@Dr. Raghavendra Mishra, JNU 

8920597559