Thursday, 5 June 2025

गुरु माधवराव गोलवलकर जी सनातन एकात्म मानव जीवन-दर्शन के विचारक के रूप में:

डॉ. राघवेन्द्र मिश्र, JNU (लेखक/रचनाकार)

वर्तमान भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण में यदि किसी एक व्यक्तित्व का सर्वाधिक योगदान रहा है, तो वह हैं गुरु जी माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर, जिन्हें स्नेहपूर्वक ‘श्री गुरुजी’ कहा जाता है। वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के द्वितीय सरसंघचालक होने के साथ-साथ एक राष्ट्र द्रष्टा, दार्शनिक, और राष्ट्रऋषि भी थे, जिनके विचारों ने सम्पूर्ण भारत के युवाओं, चिंतकों और समाजसेवकों को दिशा प्रदान किया। गुरुजी का जीवन-दर्शन भारतीय संस्कृति की आत्मा से अनुप्राणित था। वे भारत को केवल एक भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक सत्ता मानते थे। उनके विचारों में धर्म, राष्ट्र, समाज, और अध्यात्म ये सब पृथक-पृथक नहीं, बल्कि एकात्म रूप में समाहित थे।

सनातन हिंदुत्व: एक समग्र सांस्कृतिक दृष्टि

श्री गुरुजी ने 'हिंदुत्व' को संकीर्ण धार्मिक पहचान से कहीं ऊपर उठाकर एक जीवनशैली, परंपरा और मूल्य-व्यवस्था के रूप में परिभाषित किया। उनके अनुसार, "हिंदू कोई पंथ नहीं, बल्कि इस देश की भूमि, पूर्वजों, संस्कृति और जीवन-मूल्यों से निष्ठा रखने वाला प्रत्येक व्यक्ति है।"

सनातन शिक्षा और संस्कृति: चरित्र निर्माण का आधार–

गुरुजी आधुनिक शिक्षा प्रणाली के ‘पश्चिमीकरण’ पर चिंता व्यक्त करते थे। उनका मानना था कि शिक्षा का लक्ष्य केवल नौकरी या तकनीकी दक्षता नहीं, बल्कि चरित्र, आत्मबल और राष्ट्रनिष्ठा का निर्माण होना चाहिए। उन्हीं की प्रेरणा से संघ से जुड़ी विद्याभारती, भारतीय शिक्षा मंडल जैसी संस्थाएं पनपीं।

अध्यात्म और राष्ट्रधर्म:

गुरुजी ने अध्यात्म को केवल मोक्ष या आत्मकल्याण का साधन नहीं, बल्कि राष्ट्रनिर्माण का नैतिक आधार माना। वे श्रीराम और श्रीकृष्ण को केवल पूज्य देवता नहीं, बल्कि आदर्श कर्मयोगी और राष्ट्रपुरुष मानते थे। उनके जीवन से उन्होंने कर्म, भक्ति और सेवा का प्रेरणा-स्रोत लिया।

सनातन जनसेवा ही ईश्वर सेवा:

श्री गुरुजी का मूल मंत्र था “राष्ट्र सेवा ही ईश्वर सेवा है।” उनके जीवनकाल में संघ की शाखाएँ गाँव-गाँव तक पहुँचीं, और उन्होंने लाखों स्वयंसेवकों को निःस्वार्थ सेवा, सामाजिक समरसता, और जाति-विभेद से मुक्त भारत के निर्माण हेतु प्रेरित किया।

सनातन वैचारिक धरोहर:

उनकी पुस्तकें जैसे “We or Our Nationhood Defined” और “Bunch of Thoughts” आज भी लाखों राष्ट्रप्रेमियों के लिए चिंतन के स्तंभ हैं। इनमें उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत की एकता केवल संविधानिक व्यवस्था से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक समरसता और धार्मिक सहिष्णुता से टिकाऊ बन सकती है।

 मंदिर, परंपरा और समाज:

गुरुजी के अनुसार मंदिर केवल पूजा का स्थल नहीं, बल्कि सामाजिक जीवन की धुरी है जहाँ व्यक्ति अपने अस्तित्व से ऊपर उठकर समाज के साथ जुड़ता है। उनकी दृष्टि में मंदिर, पर्व, व्रत, सभी भारतीय समाज की सांस्कृतिक कड़ियाँ हैं।

श्री गुरुजी माधवराव गोलवलकर केवल संघ के नेतृत्वकर्ता नहीं थे, वे भारत के सांस्कृतिक आत्मबोध के जाग्रतक थे। उनका समर्पित जीवन हमें यह सिखाता है कि राष्ट्रनिर्माण का मार्ग केवल राजनीति से नहीं, बल्कि संस्कृति, सेवा, और अध्यात्म से होकर जाता है। आज जब भारत वैश्विक मंच पर आत्मनिर्भर और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की ओर उन्नत हो रहा है, तब गुरुजी की एकात्म दृष्टि और मूल्याधारित नेतृत्व हमारे लिए प्रेरणा का शाश्वत स्रोत है।

“गुरुजी के विचार केवल अतीत नहीं, वर्तमान और भविष्य की भी राह दिखाते हैं।”

@Dr. Raghavendra Mishra JNU 

8920597559

Tuesday, 3 June 2025

सनातन संस्कृति का प्रकृति पथ...

डॉ. राघवेन्द्र मिश्र, JNU (लेखक/रचनाकार)

मातर्भूमिः पुत्रोऽहम् का, अनहद नाद है चेतन का।
पृथ्वी को माँ माना जिसने, वह पंथ सनातन जीवन का।।
न माटी केवल संसाधन है, न वन खनिज का भंडार है,
यह चेतनता का विस्तार है, यह ऋषियों का उपकार है।।

धरती, जल, अग्नि, पवन, गगन पाँच तत्व ही ब्रह्म रूप,
इनमें ही देखा ब्रह्मांड, इनसे ही चलता जग स्वरूप।
अग्निमीळे पुरोहितं की ऋचा, आपो हिष्ठा मयोभुवाः,
सनातन की संकल्पना में, हर अणु है एक हुआ।।

वृक्ष न केवल छाया देते, ये पुण्य के भी आधार हैं,
"दशपुत्रो समो द्रुमः" यह तो स्वयं पुराणों का सार है।
जन्मोत्सव पर वट वृक्ष लगाएँ, विवाह दिवस हो पीपल दान,
एक वृक्ष से लाखों जीवन यही है सनातन की पहचान।।

गौ, नाग, वानर, गरुड़, सब पूजे गए देव समान,
मनु कहते "अहिंसा धर्मः" यही सनातन का प्रधान।
ना हिंसा, ना शोषण, ना छल, जीव मात्र में आत्मा की झलक,
सह अस्तित्व का यह आधार बना प्रकृति के प्रति शुभ ललक।।

गंगा, यमुना, सरस्वती नदियाँ हैं केवल नहीं धाराएँ,
यह तो हैं माँ के स्वरूप जीवन देती अमृत धारा लाएँ।
"गङ्गे यमुने शुद्धयन्तु नः" यह तो प्रार्थना है जल के प्रति,
लेकिन आज इन्हें बनाया केवल नाला और उद्योग की गति।।

भूमिपूजन में माटी की पूजा, यज्ञों में वायु की आरती,
तर्पण में जल की वंदना, हवन में वृष्टि की होती शुभ गति।
हर संस्कार में पर्यावरण जैसे प्राण में प्राण भर जाए,
सनातन धर्म की यह परंपरा जीवन को स्थायी स्वर दे पाए।।

जब दुनिया खोज रही समाधान संकटों में जकड़ा जीवन,
तब सनातन देता शिक्षा प्रकृति से प्रेम है मूल प्रयोजन।
SDGs हों या जलवायु संकट, उत्तर हर काल में एक ही है,
“धर्म: संरक्षणाय प्रकृते:” यही सनातन की गाथा सटीक है।।

आओ लौट चलें उन ग्रंथों की ओर, जहाँ वनों में ऋषियों का वास था,
जहाँ नदी भी देवी मानी गई, और वायु भी प्राण का विश्वास था।
यदि जागेगा फिर से यह भाव, तो पृथ्वी बनेगी स्वर्ग समान,
और विश्व बनेगा सनातनधर्मी प्रकृति के प्रति कृतज्ञ महान।।

@Dr. Raghavendra Mishra

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(संस्कृत, दर्शन, और भारतीय ज्ञान परंपरा के विद्वान)
JNU, नई दिल्ली


सनातन संस्कृति में पर्यावरण संरक्षण और संवर्धन की वैदिक, समन्वयपरक और सार्वकालिक जागृत चेतना 

डॉ. राघवेन्द्र मिश्र, JNU (लेखक/रचनाकार)

मातर्भूमि: पुत्रोऽहं पृथिव्याः अथर्ववेद का यह उद्घोष केवल एक मंत्र नहीं, बल्कि उस सांस्कृतिक चेतना का दर्पण है जिसने प्रकृति को न केवल पूज्य माना, बल्कि उसे जीवन का अविभाज्य अंग स्वीकार किया। आज जब संपूर्ण विश्व जलवायु संकट, जैव विविधता ह्रास और प्राकृतिक संसाधनों के दोहन से जूझ रहा है, तब यह आवश्यक हो जाता है कि हम अपनी सनातन संस्कृति की उन मूल अवधारणाओं की ओर लौटें, जिनमें पर्यावरण संरक्षण को न केवल धर्म, बल्कि जीवन का अभिन्न कर्तव्य माना गया।

पंचमहाभूतों में परमात्मा रूपी प्रकृति का दर्शन:

सनातन परंपरा में सृष्टि के मूल तत्त्व पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश को दैवत्व प्रदान किया गया। यह दर्शन भौतिकता के पार जाकर पर्यावरण को चेतन सत्ता के रूप में देखता है। ऋग्वेद में अग्नि को यज्ञ का देवता कहा गया है – "अग्निमीळे पुरोहितं", वहीं यजुर्वेद में जल को जीवनदायक और सुखप्रद घोषित किया गया"आपो हि ष्ठा मयोभुवाः"

भूमि, जिसे ‘माता’ कहा गया, उसके साथ पुत्रवत् संबंध की भावना आज के भौतिकतावादी भूमि उपयोग की प्रवृत्ति के विपरीत एक संतुलित उपयोग की शिक्षा देती है।

वृक्ष और वनस्पति: जीवन के शाश्वत स्तंभ:

सनातन धर्म में वृक्षों को केवल जीवनदायी नहीं, बल्कि देवस्वरूप माना गया। पद्मपुराण में वृक्षों की महिमा इस प्रकार वर्णित है –
"दशकूपसमावापी... दशपुत्रो समो द्रुमः स्मृतः"
अर्थात् एक वृक्ष लगाना दस पुत्रों के समान पुण्यदायक है। आज जबकि वनों की कटाई और जैव विविधता की हानि गंभीर चिंता का विषय है, उस परिस्थिति में सनातन परंपरा का यह वृक्ष-पूजन विश्व को एक स्थायी समाधान दे सकता है। यदि विश्व के सभी व्यक्ति अपने जन्मदिवस, विवाह, विभिन्न उत्सवों के उपलक्ष्य में केवल प्रतिवर्ष एक–एक वृक्ष लगाए तो पर्यावरण से संबंधित अधिकांश समस्याओं का समाधान हो जाएं।

पशु-पक्षियों से सह-अस्तित्व की समरस भावना:

सनातन संस्कृति किसी भी जीवधारी के प्रति हिंसा को अधर्म मानती है। मनुस्मृति में कहा गया –
"अहिंसा सर्वभूतानां धर्मं श्रेठ्ठतमं विदुः"
अर्थात् समस्त प्राणियों के प्रति अहिंसा ही श्रेष्ठ धर्म है।

गाय, नाग, गरुड़, वानर जैसे जीवों को देवी-देवताओं से जोड़कर उनकी रक्षा सुनिश्चित की गई। आज के संदर्भ में यह दृष्टिकोण जैव विविधता संरक्षण की नींव है।

नदियों, पर्वतों और जलस्रोतों की शाश्वत पवित्रता:

गंगा, यमुना, सरस्वती जैसी नदियाँ केवल जलधाराएँ नहीं, बल्कि जीवित देवियाँ मानी जाती हैं। ऋग्वेद कहता है –
"गङ्गे यमुने सरस्वति... शुद्धयन्तु नः",
अर्थात ये नदियाँ हमें शुद्ध करें।

प्रकृति की इस पवित्र दृष्टि ने गंगा को गटर बनने से रोका, किन्तु आधुनिकता के नाम पर हमने इन जीवनदायिनी जलधाराओं को प्रदूषण का पात्र बना डाला।

सनातन संस्कारों में पर्यावरण चेतना:

सनातन धर्म के विविध संस्कार, जैसे भूमिपूजन, हवन-यज्ञ, तर्पण, आदि के पीछे स्पष्ट पर्यावरणीय उद्देश्य निहित हैं। यज्ञों द्वारा वायुमंडल की शुद्धि, भूमि पूजन द्वारा भूमि के प्रति कृतज्ञता, और तर्पण से जल स्रोतों का आदर यह सब आधुनिक "सस्टेनेबिलिटी" का प्राचीन रूप है।

सनातन पर्यावरण संरक्षण और संवर्धन का वर्तमान परिप्रेक्ष्य में प्रासंगिकता:

आज जब वैश्विक समुदाय संयुक्त राष्ट्र के टिकाऊ विकास लक्ष्यों (SDGs) की ओर देख रहा है, तब हमें यह स्मरण करना चाहिए कि सनातन संस्कृति में पर्यावरण के संरक्षण और संवर्धन की सोच सहस्त्रों वर्षों से जीवन का अंग रही है। यह दृष्टिकोण केवल भारत के लिए ही नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिए मार्गदर्शक बन सकता है।

संक्षेप में कहें तो सनातन संस्कृति प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की संस्कृति है। यहाँ पर्यावरण संरक्षण कोई अधुनातन विचार नहीं, बल्कि ‘धर्म’ का स्वरूप है। हमें केवल अपने ग्रंथों की ओर लौटने की आवश्यकता है, जहां ऋग्वेद से लेकर उपनिषदों, स्मृतियों और पुराणों तक हर स्थान पर प्रकृति के प्रति श्रद्धा और संरक्षण का संकल्प रचा-बसा है।

आज आवश्यकता है इस चेतना को पुनः जागृत कर उसे नीति, शिक्षा और व्यवहार का अंग बनाया जाए। सम्पूर्ण विश्व में सनातन विकास की अर्थव्यवस्था को लागू किया जाए, जिससे विश्व का पर्यावरण संरक्षण और संवर्धन हो सके। तथा संपूर्ण विश्व में सनातन प्राणिदर्शन, सनातन जीवदर्शन और सनातन मानवदर्शन समरस भाव से स्थापित हो सके। तभी हम आने वाली पीढ़ियों को एक समृद्ध, संतुलित और सुरक्षित पर्यावरण और स्वास्थ्यपरक जीवन दे सकेंगे।

@Dr. Raghavendra Mishra, JNU 


Monday, 2 June 2025

गरीब और वंचितों के दीपक: रामविलास जी...

(एक समग्र काव्य-पुंज: कविता)

डॉ. राघवेन्द्र मिश्र, JNU (लेखक/रचनाकार)

खगड़िया की मिट्टी में, उगा एक तेजस्वी फूल,
दलितों की आँखों में, बनकर आया संकल्प मूल।
नाम मिला 'रामविलास', पर जीवन था लोकविलास,
हर हृदय की वेदना को, समझे जैसे भाव-प्रकाश।।

ना कोई सिंहासन, ना कोई कुलीन गाथा,
पर उनकी नज़र में था, भारत से असली नाता।
जिनको न इतिहास ने गिना, वह उनके गीत बने,
भीमराव के स्वप्नों को, साकार सजीव बने।।

जाति नहीं जन्म से, कर्म से मानव होता है,
जहाँ समता हो जीवन में, वहीं धर्म सजता है।
न्याय जहाँ भोजन जैसा, सम्मान हो हर घर में,
ऐसा दर्शन रामविलास ने देखा सभी अक्षर में।।

ना केवल पर्व, ना केवल रीत,
संस्कृति है जहाँ मिले सबको प्रीत।
नाट्य नहीं यदि दलित नाचे नहीं,
गीत नहीं यदि पीड़ित गाए नहीं।
संस्कृति वही जो सबका हो भाग,
जिसमें हो समरसता का अनुराग।।

संस्कृति वही जो बंदिशें तोड़े,
नवचेतना की नयी राह मोड़े।
सौंदर्य वही जहाँ अश्रु भी चमके,
जहाँ श्रमशील कर्मठ हाथ दमके।
वे कहते "रूप नहीं रंग का मोल,
सत्य का तेज है सुंदरता का गोल।।"

काग़ज़-कलम से ही तो बदले विचार,
वह शिक्षा सही, जो सबको दे प्यार।
हर बालक को दो ज्ञान की मशाल,
ताकि अंधकार में भी दिखे उसे चाल।
गाँव-गाँव में स्कूल उत्तम चले,
नारी हो या दलित सबका भविष्य फले।।

योग नहीं केवल देह का मोल,
यह तो है आत्मा का मूल अनमोल।
रामविलास ने योग को कहा,
"यह संयम है, भीतर को तोल।"
ध्यान था उनका कर्म,
और भक्ति जनसेवा धर्म।।

मंदिर के द्वार जब बंद मिले,
उन्होंने आह्वान किया “ताले खुलें!”
ईश्वर न जात पूछे, न वंश,
हर प्राणी में बसता है उसका अंश।
भक्ति वही जो बंधन तोड़े,
हर मानव को भगवन से जोड़े।।

राजनीति नहीं था उनके लिए सिंहासन,
यह है एक यज्ञ, जनसेवा का आसन।
रेलमंत्री हों या मंत्री उपभोक्ता,
हर पद पे किया समाज का सुनियोक्ता।
दलितों के हक़ की बनी आवाज़,
लोक जनशक्ति में था संघर्ष का राज।।

"ना केवल आरक्षण, चाहिए सम्मान भी,"
हर ग़रीब को मिले समान स्थान भी।
कुरीतियों से लड़े, व्यथा से भिड़े,
सत्ता में रहते हुए भी सत्य से जिए।
उनके जीवन में छिपा वह गीत,
जो गूंजेगा युगों तक संप्रीत।।

अब भले वो न हों इस धरा पर,
पर विचार हैं हर पथ, हर घर।
रामविलास वो दीप हैं, जो बुझे नहीं,
हर अंधेरे को वो आलोक से छुए सही।
पीढ़ियाँ उठें नयी उनके नाम से
समानता का झंडा ऊंचा हो शान से।।

@Dr. Raghavendra Mishra, JNU 

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रामविलास जी: भारतीय नव जागरण के दीपक...

(काव्य-श्रद्धांजलि)

डॉ. राघवेन्द्र मिश्र, JNU (लेखक/रचनाकार)

गांव की मिट्टी से उठे, भारत की शान बने,
दलितों की पीड़ा में, जग का ज्ञान बने।
नहीं थे मात्र नेता, एक विचारधारा थे,
संविधान के पृष्ठों में, साक्षात सहारा थे।।

वह राम के साथ, विलास के भी पार थे,
संघर्ष की ज्वालाओं में, दीपक की धार थे।
जयप्रकाश की क्रांति में जो रक्त से बोले,
वह संसद में भी जनसंघर्ष के रथ पर डोले।।

धर्म का स्वरूप उनके लिए ‘सेवा’ था,
मंदिर हो या मस्जिद सबमें ‘देवता’ था।
योग और आसन उनके लिए शासन था, 
जीवन की साधना थी, सत्य के लिए राशन था।

संस्कृति को केवल पर्व नहीं, परिवर्तन कहा,
हर पीड़ित में उन्होंने भारत का दर्शन कहा।
सभ्यता में समता खोजी, सौंदर्य में समाज,
जहाँ न हो कोई ऊँच-नीच, वही हो सच्चा राज।।

शिक्षा को उन्होंने दीपक कहा अंधकार में,
ज्ञान को बाँटा समान भाव के व्यवहार में।
हर हाथ में कलम हो, हर माथे पर तेज आशा, 
ऐसा भारत रचने का था उनका उत्तम अभिलाषा।।

जब दलित मंदिर के द्वार से रोका गया,
रामविलास ने वहाँ दीप जलाया।
जब समाज ने पीठ फेर लिया,
तब उन्होंने संविधान का सहारा दिखाया।।

न थे सिर्फ़ एक राज्यमंत्री, न केवल सांसद,
जनता के हृदय में थे कर्मशील, सच्चे साथ संग।
सत्ता उनके पास थी, पर अहंकार नहीं,
हर वर्ग को उन्होंने समझा ‘परिवार’ कहीं।।

हे! रामविलास मर गए पर दीप नहीं बुझा,
उनकी विरासत में न्याय के बीज सदा सुझा।
हर उस बालक की आँख में वह स्वप्न सजाए,
जो कहे ‘मैं भी बनूँगा राम’ अलख जगाए।।

@Dr. Raghavendra Mishra 

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भारत के चिराग जो दीपक बन चमके...

डॉ. राघवेन्द्र मिश्र, JNU(लेखक/रचनाकार)

जन्म लिया उस आँगन में, जहाँ न्याय की बात उठी,
रामविलास के तेज तले, नई मशाल फिर से जगी।
बिहार की मिट्टी में पले, सपनों की लौ में रंग भरे,
अभिनय को बीच में छोड़े, जन सेवा के पथ पर चले।।

पर अभिनय में न मिली शांति, न था वहाँ वह स्वप्न-स्वर,
जन की सेवा, धर्म बना राजनीति बन गई जीवन-वर।
2014 का जब चुनाव आया, जमुई की माटी ने पुकारा,
जनता ने नेता पहचाना, और जनसभा ने दीप उजारा।।

युवा था, पर जोश में दृढ़, सोच में था परिवर्तन,
'मोदी का हनुमान' बना, लिए विकास का नव-वंदन।
दलितों का मान बढ़ाया, युवाओं में दी एक आवाज़,
राजनीति में ओज भरा, किया समाज को भी आगाज़।।

पिता गए, पर लौ न बुझे, विरासत को थामा विश्वास से,
पारस से अलग राह चली, पर हिम्मत रही साहस से।
LJP को बाँट दिया गया, पर ध्वज वही रामविलास का,
‘रामविलास’ नाम से फिर खड़ा, चिराग बना दीप विकास का।।

2024 की फिर से रणभेरी, NDA ने जो संग बुलाया,
जमुई की माटी फिर मुस्काई, विजयी चिराग को लौटाया।
दलित, युवा, किसान का नेता, भाषण में गूंजे तेज स्वर,
जो कहे "मैं नेतृत्व लूँगा, बनकर नव भारत का क्षितिज भवर।"

वह केवल एक नेता नहीं, एक विचार की नई मशाल है,
जो दुश्मनों से ना झुका, जो युग के प्रश्नों का उत्तरकाल है।
नाम है उसका चिराग, पर कार्यों में सूरज का देश है,
आज के भारत में वह, राजनीति का नया संदेश है।।

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गुरु गोरखनाथ: योग सम्राट की महागाथा

डॉ. राघवेन्द्र मिश्र, JNU (लेखक/रचनाकार)

त्रिकालदर्शी, योगरथी, शिव-स्वरूप महान।
गोरखनाथ कहाए जो, जागे जन के प्रान॥

हिमगिरि के तपवन से, फूटी एक पुकार,
धरती के तम को हर ले, भेजूँ योगाचार!"
शिव ने फूँका मंत्र फिरा, मच्छिंद्र में प्रान,
जन्मे शिष्य गोरख तब, बन भारत का गान॥

ना जाति बंधन, ना कुल नाम,
गोरख का हैं केवल ‘योग’ काम।
शैशव में साधक, मौनी ध्यान,
माँ की गोद, पर ब्रह्म का ज्ञान॥

गुरु मच्छिंद्र ने देखा ध्यान,
ज्योतिर्मय वह साधक जान।
बोल उठे "यह तो है ज्ञान चंदन,
शिव के ही अंश का है स्पंदन!"

दीक्षा दी "अलख निरंजन" का,
सिखलाए मार्ग हठयोग का।
श्वास, चक्र, काया का राज,
गोरख बने महायोगी आज।

"काया ही काशी है" कहकर,
उन्होंने तन को साधन माना।
ना कर्मकांड, ना यज्ञ हवन,
योगमार्ग ही परम सम्माना॥

नासिका में प्राण की लहर,
मूलाधार से सहस्रार की डगर।
कुंडलिनी जागरण का मूल,
गोरख बताएं शिव का फूल॥

"आपे गुरू, आपे चेला" –
अंधश्रद्धा से मुक्त करेला।
विद्या, मन्दिर, शास्त्र द्वार,
मन का ध्यान, यही संसार॥

जात-पांत का खंडन किया,
नारी, शूद्र सबको दिया,
समता, करुणा, ज्ञान का सिंचन,
मानव धर्म को दिया नव चिंतन॥

"गगन मंडल में झूला झूले,
तहाँ बिराजे ज्ञानी।"
ऐसे गूढ़ प्रतीक कहें,
भाषा में गोरख बानी।।

उनके शब्द न केवल पद्य,
बल्कि ब्रह्म का अनुभव अद्य।
शब्द बने जीवंत प्रकाश,
हर मन में खोलें आत्मा का आशा॥

गोरख चले गाँव-गाँव,
उजले पथ और करें ठाँव।
भाषा में बोले देश की बात,
हर दिल को जोड़े साथ-साथ॥

कहीं वे बाबा, कहीं औलिया,
कहीं सिद्ध, कहीं संत कहाए।
सनातन हिन्दू, सभी समुदाय,
गोरख को अपने गुरु बनाए।।

बारह पंथ बने प्रचारक,
नाथों के जग में दीपक।
जोगी, कंफर, अवधूता धारा,
गोरख की अमर ललकारा॥

नेपाल से लेकर कर्नाटक तक,
हिमालय से लेकर सिन्धु तट।
गोरख की बानी, उठे गूँज,
"जाग रे मानव, खुद को पूज!"

शृंगार नहीं बस लौकिक भाव,
परमात्मा से मिलन की चाह।
नारी, नयन, गगन, चाँदनी,
सब योगिक चित्त की रागिनी॥

प्रेम, विरह और आत्म मिलन,
काव्य में रचे ज्ञान के धन।
प्रतीकों में उन्होंने बाँधा,
रहस्य जहाँ शिव-शक्ति साधा॥

गोरखपुर में मठ खड़ा,
आज भी है चेतन बड़ा।
योग, साधना, देश शक्ति,
गोरख परंपरा सदा भक्ति॥

जो बोले वह कर्म बने,
जो जिए वह धर्म बने।
नाथ परंपरा उनका नाम,
जग में गूंजे "गोरख" गान॥

जय हो योगी, ब्रह्म स्वरूप,
गोरखनाथ लोक के भूप।
जिसने घन अज्ञान हटा दिया,
हर आत्मा को शिव का किया।।

भारत भूमि धन्य हुई,
जब योगी ने आँखें खोलीं।
उसके बाद से अब तक,
गूँज रही है गोरख बोली।।

@Dr. Raghavendra Mishra 

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