Wednesday, 21 May 2025

सनातन जम्मू-कश्मीर में मन्दिरों की मणिमाला

डॉ. राघवेन्द्र मिश्र (लेखक/रचनाकार)

उत्तर में जहाँ ताज हिमगिरि धरे,
देवों की लीला वहाँ निर्झर बहे।
जम्मू-कश्मीर, तप की धरा रे,
मन्दिरों में वहाँ शुभ धर्मध्वजा फहरे॥१॥

अमरनाथ की गुफा गूंजे,
शिव के नाम का शंख बजे।
हिम से बने लिंग जो प्रकटे,
श्रद्धा से जन मन पुलक उठे॥२॥

त्रिकूटा वासी वैष्णो माता, 
शरणागत को रक्षक दाता।
गुफा में दीप धरे मन साथा,
माँ के दर पे झुके हर माथा॥३॥

शंकराचार्य पर्वत की छाया,
शिव समाधि का वह उपाया।
डल झील के ऊपर जो विराजा, 
शिव, सत्य, ज्ञान वहाँ सुसाजा॥४॥

मार्तंड सूर्य का पुरातन ध्यान,
ललितादित्य का तेज महान।
खंडहर गाथा कहता बारंबार, 
यह सूर्यदेव का दिव्य उपहार॥५॥

रघुनाथ मंदिर जम्मू जन में बसा,
राम नाम का अमृत पुष्प बरसा।
सोने की आभा शिखरों में सजा,
भक्ति है यहां जन तन मन में रजा॥६॥

रणबीरेश्वर, शिवशक्ति स्वरूप,
आठ शिवलिंग जपहि सब भूप।
पूजन होता वहां संग दीप–धूप, 

हर भक्त वहाँ हरि का ही रूप॥७॥

महालक्ष्मी जूड़े में चंद्रिका,

धन, ऐश्वर्य की मातरिका।

भक्ति में रमते सब व्यापारी,
माँ के चरणों में अब जीवन सारी॥८॥

नगली साहिब में गुरु छाया,
सिख-हिंदू का एक समर्पण भाया।
भक्ति, सेवा, लंगर का माया,
संघ शक्ति का सुंदर शिव काया॥९॥

श्री भद्रकाली उग्र रूप धारिणी,
रक्षा करें मातृसत्ता की वारिणी।
चामुंडा, दुर्गा, काली सम वाणी 
शक्ति स्वरूपा भवानी सब प्राणी॥१०॥

गुप्त गंगा, हरि परबत का गान, 
शारदा पीठ ज्ञान का उच्च शान।
जेष्टेश्वरा, महाकाल का उत्तम धाम,
कण-कण शिवमय, क्षण–क्षण सीताराम॥११॥

न जाने कितने तीर्थ बसे,
घाटी में पुण्य कथा सरसे।
हज़ारों मंदिर कुछ विख्यात से,
कुछ वीराने में, वे हैं दिव्यप्रभात से॥१२॥

ओ यात्री! यदि तू यहाँ आए,
श्रद्धा का दीप साथ में लाए।
यह कश्मीर न केवल सौंदर्य मन भाए, 
यह सत्य सनातन की अमर वाणी गाए॥१३॥

@Dr. Raghavendra Mishra 

सनातन जम्मू कश्मीर के देवालय

डॉ. राघवेन्द्र मिश्र (लेखक/रचनाकार)

हिमगिरि की छाया में जहाँ गूंजे शिव का नाम,
अमरनाथ की गुफा में बसा है शाश्वत धाम।
हिमलिंग वहाँ प्रकट हो जाते, श्रावण में हर वर्ष,
श्रद्धा, तप और भक्ति से हो जाता जगत हर्ष।।

मार्तंड का वह सूर्य मंदिर, वैभव की इक छाया,
ललितादित्य ने रचा जिसे, जिसकी कथा जन गाया।
खंडहरों में भी तेज है, इतिहास वहाँ मुस्काता,
कश्मीर के भूपों में आज भी वह रश्मि बरसाता।।

शंकराचार्य पर्वत चढ़े, जहाँ शिव ध्यान लगाते,
डल झील की लहरों में भी, मंत्र जपित हो जाते।
श्रीनगर की ऊँचाई पर, मंदिर प्राचीन महान,
जहाँ दर्शन पा भक्त जन, पाते निर्वाण समान।।

जम्मू की नगरी में गूंजे, रघुनाथ का प्यारा नाम,
कृष्ण मंदिरों में सजीव हैं, लीला के विविध धाम।
कुपवाड़ा से बारामुला, पुलवामा से अनंतनाग,
हर नगर गाँव में रचे हैं, श्रीहरि के पावन राग।।

भव्य रथों में शोभा यत्रा, ज्योति उठे हर द्वार,
कश्मीर की माटी भी गाती, वैदिक युग का सार।
सनातन की उस पताका को, आज पुनः लहराएँ,
हर मंदिर में दीप जलाकर, भारत को सजाएँ।।

@Dr. Raghavendra Mishra 

त्रिकूट शिखर पर दीप जले हैं, श्रद्धा के अंगार

डॉ. राघवेन्द्र मिश्र (लेखक/रचनाकार)

त्रिकूट शिखर पर दीप जले हैं, श्रद्धा के अंगार,
जहाँ विराजें वैष्णवी माता, ज्योति जगे अपार।
बाणगंगा की धारा कहे, चरण पादुका गाथ,
हर शिखर, घाटी बोले जय माता दी एक साथ।।

शरणागत की रक्षा करती, देवी अन्नपूर्णा,
कभी काली, कभी सरस्वती, कभी लक्ष्मी पूर्णा।
गुफा में तीन पिंडियाँ, त्रिगुण रूप त्रिवेनी,
जहाँ दर्शन कर मुक्त हो जीव, कटे मोह के रैनी।।

पुराणों की वाणी गूंजे, स्कंद और देवी कथाएँ,
अर्जुन की भक्ति वहाँ पहुँचे, जहाँ सृष्टि झुक जाए।
राम ने जहाँ तप किया था, शक्ति का वर माँगा,
वहाँ आज भी भक्तों में, वही तेज है जागा।।

इतिहास गाए वैदिक स्वर, संस्कृति के साज,
राजाओं से लेकर ऋषियों तक, यह भूमि बनी राज।
शारदा पीठ का तेज समाया, माता की मुस्कान में,
संस्कृति, सभ्यता, योग-साधना सब त्रिकूट के धाम में।

गुफा की राह तप की राह, योगिनी प्यारी,
अर्धकुमारी की साधना में, कन्या रूप धारी।
हर डगमग पग में माँ का नाम, साधक की पुकार,
चलो उसी ओर जहाँ आत्मा से हो साक्षात्कार।।

ज्ञान भैरव की गहराई में, देवी तत्त्व समाया,
शिव की अर्धांगिनी शक्ति ने, योगमयी रूप पाया।
कुंडलिनी से लेकर ध्यान तलक, सब पथ यहीं से जाता,
जहाँ भक्ति हो योग में परिणत, वही वैष्णो माता।।

माता की भेंट न धन माँगे, न पद की कोई आस,
वो केवल भाव की भाषा समझे, करुणा का प्रकाश।
श्रद्धा से सब आएं भक्त जन, कटरा तक पुकार,
जय माता दी की गूँज चले, अम्बा हो तैयार।।

शास्त्रों ने भी शीश नवाया, वेदों ने की वंदना,
तांत्रिकों ने साधा स्वरूप, संतो ने की आराधना।
भक्ति की यह उच्च प्रतीति, शक्ति से पूर्ण नाता,
जहाँ पिंडियों में मां बसी हों, वही वैष्णो माता।।

मंदिर का संचालन जिसने, सेवा को धर्म बनाया,
श्राइन बोर्ड की छाया में, युगधर्म फिर से आया।
अस्पताल, पाठशाला में, माँ की छवि गान
सामाजिक सेवा में श्रद्धा, माँ करो मम कल्यान।।

हे वैष्णवी! त्रिकाल की तू, साधक की तू आस,
कश्मीर की धरती से, फैला तेरा प्रकाश।
शिव की तू आराध्य शक्ति, योगिनी तू महान,
तेरे दर पे मिटते हैं, दुखों के सब विधान।।

@Dr. Raghavendra Mishra 

जम्मू कश्मीर सनातन की स्वरगाथा

डॉ. राघवेन्द्र मिश्र (लेखक/रचनाकार)

हिमगिरि की गोदी में वसुधा की कान्ति,

जहाँ बहती चिरंतन ज्ञान की शान्ति।
वह भूमि जहाँ ऋषि-ज्ञान प्रकटे,
शिवसूत्र जहाँ अनहद शब्द लपेटे।।

सरिताओं से सिंचित वह सतीसर धाम,
जहाँ प्रकटे कश्यप, जहाँ ज्ञान का काम।
निलमतपुराण की कथा में जो जागे,
शारदा की जिह्वा से वेद जहाँ लागे।।

जहाँ अभिनवगुप्त ने दीप जलाया,
तंत्रालोक में ब्रह्मज्ञान समाया।
प्रत्यभिज्ञा की प्रतिध्वनि हर घाटी में,
भैरव का विज्ञान छिपा शुभ माटी में।।

राजतरंगिणी कल्हण की लेखनी,
इतिहास में उकेरी सच्ची रेखनी।
मम्मट के छंदों में अलंकार बोले,
काव्यप्रकाश में सरस्वती डोले।।

शारदा पीठ जहाँ विद्याओं का वास,
ज्योतिष, व्याकरण, तंत्रों का प्रकाश।
काश्मीर की पीठों से उपजी परंपरा,
संस्कृति बनी युगों तक अमर धरोहरा।

अवंतीस्वामी, मार्तंड की मूरतें,
सूर्य मंदिरों की स्वर्णिम सूरतें।
हरि पर्वत, अमरनाथ के गह्वर,
ध्यानस्थ योगी, तपस्वी अंबर।।

बहे ज्ञान की नदियाँ हिमगिरि से,
शिवशक्ति की साधना निर्झरि से।
शिवसूत्रों का नाद अनन्त गुंजे,
विज्ञान भैरव में ब्रह्म को पुंजे।।

यहाँ शैव, वैदिक, तांत्रिक रस,
योग-मुद्राओं से जुड़ा हर शुभ यश।
कुंडलिनी जगे जिस ध्यान विधा में,
नाद-बिंदु मिले जिस प्राण सुधा में।।

कश्मीरी पंडितों की पुण्य परंपरा,
जिनकी स्मृति बनी साक्षात् धरोहर अपरा।
वेदशास्त्र जिनके चित्त की श्वास,
भारतीय चेतना का उज्ज्वल प्रकाश।।

यह भू न केवल धरती का अंश,
यह तप, योग, ज्ञान का शुभ हंस।
सनातन संस्कृति की सजीव कथा,
हिमगिरी की गोद में अमृत मथा।।

@Dr. Raghavendra Mishra 

नारी हो या नर कोई भी, जब गुरु चरण पावै,

ज्ञान-ज्योति तब चित्त में उदित, स्वयं शिव बनि आवै।

डॉ. राघवेन्द्र मिश्र (लेखक/रचनाकार)

अमरनाथ की शीत शरण में, जागे ज्ञान प्रखर, 

लक्ष्मण जू की वाणी में था, तत्त्वत्रय का स्वर।
शैव रहस्य प्रकट हुआ जब, मौन मुनि मुस्काए,
दो नारियाँ बन चलीं शिष्या, योग दिशा अपनाए।।

एक थी बेट्टिना बूम, विदेशी कुल की मान,
सांस्कृतिक सौंदर्य खोजती, पहुँची भारत धाम।
स्वामी की चरणों में बैठी, पाया शिव का ज्ञान,
ग्रंथों को अर्थवती किया, जगा दिया विज्ञान।।

शब्दों में उतरी चैतन्य की, अगम कथा अपार,
अभिनवगुप्त की व्याख्या में, प्रकट हुआ विस्तार।
वेद तंत्र संहिता सजीव, उनके कलम ने राचे,
पश्चिम में फैली प्रभा शिवा की, ऋषि वाक्य मुखर बाचे।।

नारी थीं वे, शुभ ज्ञान दीप थीं, शैवभाव में लीन,
नारीत्व का तेज बनीं वे, शिवशक्ति में विलीन।
लक्ष्मण जू की अमर धरोहर, दोनों ही स्तम्भ शान,
कश्मीर की तत्त्व-ब्रह्मधारा में, बन गईं विलक्षण नाम।।

शिव की लीला, गुरु की कृपा, शिष्या में जो जागे,
भाषा, देश, शरीर का बंधन, तत्वमार्ग न लागे।
नारी हो या नर कोई भी, जब गुरु चरण पावै,
ज्ञान-ज्योति तब चित्त में उदित, स्वयं शिव बनि आवै।

@Dr. Raghavendra Mishra 

हे लक्ष्मण जू! हे शिवतुल्य ज्ञानी,

तुमसे ही पुनः जीवित शिव वानी।

डॉ. राघवेन्द्र मिश्र (लेखक/रचनाकार)

कश्मीर की घाटी में गूंजा स्वर, जहाँ हिम की चुप्पी कहे रहस्य।
वहाँ जन्मा एक योगीराज, जिनकी दृष्टि थी शिवमय स्पर्श।

लक्ष्मण नाम, पर जू कहें सब,वह जन में नहीं, शिव के सदृश।
जिसने तंत्र के मौन सूत्र को, शिवमय किया, जहां थे अदृश्य।।

न थे वे केवल ग्रंथों के ज्ञाता,

थे शिव के वे साक्षात् अनुभव।

प्रत्यभिज्ञा का पथ दिखाया,

कि तू ही शिव, बस कर अनुभव।।

बाल्य से ही तप की थी लौ, ध्यान बना जीवन का शुभ सार।
मौन साधना, मंत्र की धार, जहाँ समय थमता हर बार।।

स्पन्द ही शिव है, जान तू यह, हर गति में है परमेश्वर छिपा।
कहते थे वो मंद मुस्कान से, और घट में शिव को सदा दिखा।।

न कहीं तू भिन्न है शिव से, न कोई दूरी, न कोई द्वार।
बस जाग तू उस ज्ञान में, जहाँ 'मैं' भी है शिवाकार।।

शब्द उनके मन्त्रवत् बहते, भक्ति और बोध से पूर्ण दृष्टि।
संस्कृत के गूढ़ रहस्यों को, किया सहज जैसे शुभ काव्य सृष्टि।।

विदेशों के जिज्ञासु जन भी, खींचे आए उस दीप संग।
जहाँ गुरु न केवल आचार्य, थे अनुभूति का जीवंत अंग।।

ईश्वर आश्रम बना तीर्थस्थल, ज्ञान जहाँ बहे शिवसरिता सा।
प्रश्नों के चिता में वो सदगुरु, जैसे चैतन्य के दिव्य वर्षा सा।।

मृत नहीं वह, कालातीत हैं, शिवदृष्टि के वह बीज अनन्त।
जो साधक के हृदय पटल में, जगाते हैं निर्वाण के तीव्र सन्त।।

हे लक्ष्मण जू! हे शिवतुल्य ज्ञानी,

तुमसे ही पुनः जीवित शिव वानी।

कश्मीर का तत्त्व, त्रिक के सार,
तेरे चरणों में समर्पित सब प्रानी।।

@Dr. Raghavendra Mishra 


हे लक्ष्मण जू! प्रणाम तुझे, तू आचार्य, तू दिव्य मित्र।

डॉ. राघवेन्द्र मिश्र (लेखक/रचनाकार)

हिमवद् शिखर की छाया में, मन में हुआ तमराज 
उत्पन्न हुए योगी वहां, जो चैतन्य के अधिराज।।
वाणी जिनकी वेदवत् थी, दृष्टि में शिव का विलास,
जिनके ध्यान नयन तले, शून्य भी बन जाए प्रकाश।।

लक्ष्मण जू, वह ज्योति स्वरूप, शिवतत्त्व के हैं साक्षात्कार,
जिनकी श्वासों में गूँज रहा था, अद्वैत तंत्र का अमृत धार।
बाल्यकाल में ही प्रकट हुआ, जो अनुपम बीज शिवज्ञान का,
शब्दों में वे शिव मंत्र बहे, जग को दे मोक्ष शैव विज्ञान का।।

न शुष्क शास्त्र, न केवल ग्रंथ, जीवन बना प्रतीति का मंत्र।
‘शिवसूत्र’ का सार बहे, विज्ञानभैरव’ का साक्षी शुभ तंत्र।।

वह बोले न तू भिन्न शिव से, न ही सीमित यह तुच्छ मन।
जो भी जागे, पहचान सके, वही तत्त्व, वही चैतन्य धन।।

शिव मैं हूँ, न कोई भेद, प्रत्यभिज्ञा का यह मूल तत्त्व।
जब मिट जाएं द्वैत के बन्धन, तब जागे आत्मा का सत्त्व।।

शांत चित्त, गम्भीर दृष्टि, नयन नीरव, मन पूर्ण शुद्ध।
हर वाक्य उनका अग्निवत् जला दे अज्ञान का घोर युद्ध।।

विदेशों तक गूँजा स्वर उनका, ज्ञान बना जो त्रिक की नाव।
संस्कृत की उस गूढ़ गाथा को, किया सरल, सुसहज बहाव।।

ईश्वराश्रम बना तीर्थ वो, जहाँ विचार में न कोई व्याधि।
जन्मों की थकान मिटे, जहाँ चित्त को शिवमय समाधि।।

हे लक्ष्मण जू! प्रणाम तुझे, तू आचार्य, तू दिव्य मित्र।
तेरे ज्ञानस्रोत से हमने, पाया शिव का सत्य सुचित्र।।

तेरा जीवन एक दीपशिखा, प्रत्यभिज्ञा की दीर्घ पुकार,
जहाँ 'मैं' और 'तू' विलीन हो, बस बचे शिव का विस्तार।।

@Dr. Raghavendra Mishra