Thursday, 20 February 2025


वैश्विक सनातन ज्ञान पद्धति में कला युगातीत है, सनातन संस्कृति सीमातीत है और सनातन जीवनमूल्य समयातीत है l ॐ डॉ राघवेन्द्र मिश्र ॐ 🙏


In the global Sanatan knowledge system Sanatan art is ageless, Sanatan Culture is borderless and Sanatan Life values are timeless.

ॐ Dr. Raghavendra Mishra ॐ 

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@Dr Raghavendra Mishra 

 
 

Wednesday, 15 January 2025

 एचएमवी ने एक बार ग्रामोफोन रिकॉर्ड का इतिहास देते हुए एक पुस्तिका प्रकाशित की थी।                                                                   

                                                                           

ग्रामोफोन का आविष्कार थॉमस अल्वा एडिसन ने 19वीं शताब्दी में किया था। एडिसन, जिन्होंने बिजली की रोशनी और मोशन पिक्चर कैमरा जैसे कई अन्य गैजेट का आविष्कार किया था, अपने समय में भी एक किंवदंती बन गए थे।                 

                                                                           

जब उन्होंने ग्रामोफोन रिकॉर्ड का आविष्कार किया, जो मानव आवाज को रिकॉर्ड कर सकता था, तो वे अपने पहले टुकड़े पर एक प्रख्यात विद्वान की आवाज रिकॉर्ड करना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने प्रो. मैक्स मूलर को चुना। उन्होंने उन्हें लिखा "मैं आपसे मिलना चाहता हूं और आपकी आवाज रिकॉर्ड करना चाहता हूं। मुझे कब आना चाहिए?" मैक्स मूलर जो एडिसन का बहुत सम्मान करते थे, ने उन्हें उस दिन आने के लिए कहा जब यूरोप के अधिकांश विद्वान

इंग्लैंड में एकत्र होंगे।                                             

                                                                           

तदनुसार, एडिसन एक जहाज लेकर इंग्लैंड गए। उन्हें दर्शकों से मिलवाया गया। सभी ने एडिसन की उपस्थिति पर खुशी मनाई। बाद में एडिसन के अनुरोध पर मैक्स मूलर मंच पर आए और यंत्र के सामने बोले। फिर एडिसन अपनी प्रयोगशाला में वापस चले गए और दोपहर तक एक डिस्क के साथ वापस आ गए।                                                                     

                                                                           

उन्होंने अपने यंत्र से ग्रामोफोन डिस्क बजाई। दर्शकों को वाद्ययंत्र से मैक्स मूलर की आवाज़ सुनकर बहुत खुशी हुई। वे इस बात से खुश थे कि मैक्स मूलर जैसे महान व्यक्तियों की आवाज़ को भावी पीढ़ी के लाभ के लिए संग्रहीत किया जा सकता है।                                                     

                                                                           

कई बार तालियाँ बजाने और एडिसन को बधाई देने के बाद, मैक्स मूलर ने विद्वानों को संबोधित किया "आपने सुबह मेरी मूल आवाज़ सुनी और दोपहर में भी वही आवाज़। क्या आप समझते हैं कि मैंने सुबह क्या कहा या आपने दोपहर में क्या सुना?"                             

                                                                           

कई यूरोपीय विद्वानों सहित दर्शक चुप हो गए क्योंकि वे उस भाषा को नहीं समझ पा रहे थे जिसमें मैक्स मूलर ने बात की थी। मैक्स मूलर ने तब समझाया कि वह जिस भाषा में बात कर रहे थे वह संस्कृत थी और यह ऋग्वेद थी। यह ग्रामोफोन प्लेट पर रिकॉर्ड किया गया पहला सार्वजनिक संस्करण था।                                                                                                                                       

मैक्स मूलर ने इसे क्यों चुना? उन्होंने श्रोताओं को संबोधित करते हुए कहा, "वेद मानव जाति का सबसे पुराना ग्रंथ है। और अग्नि मीले पुरोहितम ऋग्वेद का पहला श्लोक है। सबसे प्राचीन समय में जब यूरोप के लोग चिम्पांजी की तरह पेड़ से पेड़ पर कूद रहे थे, जब वे अपने शरीर को ढंकना नहीं जानते थे, खेती करना नहीं जानते थे और शिकार करके अपना जीवन यापन करते थे और गुफाओं में रहते थे, भारतीयों ने उच्च सभ्यता प्राप्त की थी और उन्होंने दुनिया को वेदों के रूप में सार्वभौमिक दर्शन दिया।"

 *महाभारत और पुराणों के अनुसार ब्रह्माण्ड/सृष्टि/ जगत/पृथ्वी की उत्पत्ति प्रक्रिया*


सृष्टि उत्पत्ति प्रक्रिया के विषय में कहा जाता है कि जिस प्रकार मनुष्य की श्वासोच्छ्‌वास प्रक्रिया स्वभाविक है, तथाविध रूप से यह सृष्टि भी उत्पन्न और विनष्ट होती हैl सृष्टि का अर्थ किसी नवीन पदार्थ की उत्पत्ति नहीं, अपितु अव्यक्त का व्यक्त होना है। ‘सृष्टि' शब्द का अर्थ है- सर्गl सृष्टि, सत्तावान् जगत् का नाम रूप व्याकरण मात्र है। "अनेन जीवेनात्मनाऽनूप्रविश्य नामारव्ये व्याकरवाणि" इस प्रकार वेदान्तियों ने एक मात्र सत् तत्त्व ब्रह्म' को इस नामरूपात्मक जगत् का बीज कारण बताया है। ब्रह्म से ही समस्त भौतिक जगत् की उत्पत्ति होती है।

सृष्टि के आदि में अचेतन प्रकृति से चेतन स्वरूप के उद्भव के सन्दर्भ में ऋग्वेद का मन्तव्य समीचीन है:


ब्रह्मणस्पति संकर्मार इवा चमत्। देवानां युगे प्रथमेऽसतः सदजायत्।।"(ऋग्वेद.10/72/2)


अर्थात तुष्टि के आदि में ब्रह्मपति से देवों और असत् से सत् का प्रादुर्भाव हुआ। श्रीमद‌भगवद्‌गीता में विविध यज्ञ का रहस्य उ‌द्घाटन करते हुए सृष्टि-प्रक्रिया का ध्वयांकन किया गया है-


अफला-कांक्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते।

 यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः ।। 

अभिसंधाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत्। 

इज्यते भरत श्रेष्ठ तं यज्ञं विद्धि राजसम् ।। 

विधिहीनमसृष्टान्न मन्त्रहीनमदक्षिणम्। श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते।।" 

(श्रीमद्भगवतगीता– 17.11-13)


महाभारत में भी प्रजापति द्वारा सृष्टि रचना प्रक्रिया का सविस्तार उल्लेख प्राप्त होता है- प्रजापतिरिद सर्व मनसैवासृजत् प्रभुः । (महाभारत)

तथैव देवान् ऋषयस्तपसा प्रतिपेदिरे।। आदिदेवसमुद्‌भूता ब्रह्ममूलाक्षराव्यया। सा सृष्टिर्मानसी नाम धर्मतन्त्रपरायणा।।


सृष्टि उत्पत्ति प्रक्रिया के सन्दर्भ में जब हम पुराणों की ओर अपना ध्यान आकृष्ट करते हैं तो पाते हैं कि पौराणिक मतानुसार इस सृष्टि के मूल में एक परम तत्त्व है। पुराणों में चारों वर्गों की सृष्टि का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि सृष्टि की कामना करते हुए ब्रह्मा जी ने तमोगुण से असुरों को पैदा किया। सात्त्विक गुण से देवों को व आंशिक सत्त्वमय देहधारी पितरों का प्रादुर्भाव हुआ। तथा इसी क्रम में रजोगुण से मानव जाति को उत्पन्न किया गया।


अग्निपुराण में जगत् की सृष्टि रचना का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि श्रीभगवान ही जगत् की सृष्टि आदि के कर्ता हैं और वे सगुण व निर्गुण रूप से प्रकृति को अधिष्ठान बनाकर अपनी योग माया से सम्पूर्ण जगत् के रूप में परिणत होते है-


जगत्सर्गादिकां क्रीडां विष्णवोर्वक्ष्येऽधुनाश्रृणु।

स्वर्गादिकृत्स सर्गादिः सृष्ट्यादिः सगुणोऽगुणः।।

(अग्नि पुराण – 17/1/30)


मत्स्य पुराण में सृष्टि रचना प्रक्रिया पर प्रकाश डालते हुए कहा है कि जल की उत्पत्ति के पश्चात् प्रजापति देव ने सृष्टि की अभिलाषा व्यक्त की। इस विषय में मत्स्य पुराण का मन्तव्य बड़ा ही सारगर्भित है-


स सिसृक्षुरभूद् देवः प्रजापतिररिदम।


तत्तेजसश्च तत्रैष मार्तण्डः समजायत ।।


मृतेऽण्डे जायते यस्मान्मार्तण्डस्तेन संस्मृतः।

(मत्स्य पुराण)

अर्थात् शत्रुदमन। जब उन प्रजापति देव की सृष्टि रचना की इच्छा हुई तब वहीं पर उनके तेज से ये मार्तण्ड (सूर्य) प्रादुर्भूत हुए, क्योंकि ये अण्डे के मृत हो जाने के पश्चात् उत्पन्न हुए थे, और इसीलिए ये 'मार्तण्ड' कहनाए।


भविष्य पुराण में बतलाया गया है कि अन्न से ही प्राणी उत्पन्न होते हैं। अन्न से ही सम्पूर्ण संसार संचालित है। इसलिए अन्न ही लक्ष्मी है। अन्न को ही ब्रह्म मानकर सम्मान दिया गया है और उसी में सभी प्राणियों के प्राण प्रतिष्ठित है-

अन्नं ब्रह्म यतः प्रीतमन्ने प्राणा प्रतिष्ठिताः।

अन्नाद् भवन्ति भूतानि जगदन्नेन वर्धते ।।

अम्मेव यतो लवमीरग्नमेव जनार्दनः ।

धान्यपर्वतरूपेण पाहि तस्मान्नगौतम।।"

(भविष्य पुराण–195/43–44)

 

सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के सुव्यवस्थित संचालन के लिए ईश्वर-जीव एवं प्रकृति इन तीनों की सत्ता को स्वीकार किया गया है। सृष्टि विषयक ऋषि-महर्षियों के चिन्तन का अध्ययन करने से यह भी ज्ञात होता है कि विष्णु को सृष्टि रचना के मूल तत्त्व के रूप में प्रकट किया गया है. किन्तु सुष्टि रचना रूपी यज्ञ के निर्विघ्न सम्पन्न होने में ब्रह्मा, विष्णु व महेश का महनीय योगदान है। विष्णु से ब्रह्म सृष्टि रचना कर्म हेतु उद्यत होते हैं। अर्थात् विष्णु ही ब्रह्म (प्रजापति) के रूप में सम्पूर्ण जगत की रचना करते है, जबकि शेष पुराणों में शिव की प्रेरणा से सृष्टि रचना प्रक्रिया रूपी यज्ञीय कर्म सम्पन्न होता हैं इस प्रकार संस्कृत वाङ्मय की विविध विधाओं में निहित सृष्टि तत्त्व का अध्ययन करने से यह स्पष्ट द्योतित होता है कि ये ग्रन्ध सृष्टिविषयक ऋषि-मुनियों के गूढ़ एवं गहन चिन्तन से परिपूर्ण हैं।

 *सनातन ग्रन्थ/ज्ञान परम्परा में ब्रह्माण्ड/सृष्टि/जगत/पृथ्वी का जन्मतिथि निर्धारण और उत्पत्ति प्रक्रिया*


भारतीय सनातन संस्कृति में चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा (1) तिथि को सृष्टि का प्रारम्भिक दिवस माना गया है। शास्त्रों का कथन है कि सृष्टि कर्ता ब्रह्मा जी ने इसी दिन सृष्टि का निर्माण प्रारम्भ किया था। ब्रह्मपुराण में लिखा है-


चैत्रे मासि जगद ब्रह्मा संसर्ज प्रथमेऽहनि।

शुक्लपक्षे समग्रे तु सदा सूर्योदये सति ।। (ब्रह्मपुराण)


अर्थात् ब्रह्मा जी ने चैत्र मास के शुक्ल पक्ष के प्रथम दिन सूर्योदय होने पर सृष्टि रचना का कार्य प्रारम्भ किया, और इसीलिए भारतीय काल गणना में इस दिन से नववर्ष के प्रारम्भ की मान्यता है। इस पावन तिथि में ब्रह्मा जी की सविधि पूजा करने के उपरान्त उनसे नववर्ष के शुभ होने की प्रार्थना की जाती हैं-

भगवंस्त्वत्-प्रसादेन वर्ष क्षेममिहास्तु मे।

सवंत्सरोपसर्गा में विलयं यान्त्वशेषतः ।।(ब्रह्मपुराण)

महाभारत के शान्ति पर्व में भी अग्नि में दी गई आहुति का सूर्य को प्राप्त होना तथा सूर्य से वृष्टि व सृष्टि से अन्न तथा अन्न से प्रजा की उत्पत्ति के प्रमाण मिलते हैं।'

(महाभारत, शान्ति पर्व)

सृष्टि में आदिकाल से ही यज्ञ और मानव का घनिष्ठ सम्बन्ध रहा है। श्रीम‌द्भगवद्गीता में मनुष्य जाति के जीवन का प्रारम्भ ही मूलतः यज्ञ से माना गया है।


सहयज्ञाः प्रजा सृष्टवा पुरोवाच प्रजापतिः।

अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्ट कामधुक् ।।

देवान् भवायतानेन ते देवाः भावयन्तु व:।

परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ ।।

(श्रीमद्भगवत गीता)

अर्थात् ब्रह्मा ने सृष्टि रचना के समय यज्ञ का वैशिष्ट्य दिखलाते हुए मानव जाति की उन्नति और मनोवांछित फलों की प्राप्ति यज्ञ से ही सिद्ध की है। मूलतः यज्ञ, प्रकृति और जीवन को परिपुष्ट करने का एक वैज्ञानिक उपाय है। सूर्यादि देवों का भौतिक सृष्टि के रूप में परिणत होना तथा भौतिक सृष्टि का पुनः देवमय होने का नाम ही यज्ञ है, जो सृष्टि चक्र व सृष्टि प्रक्रिया है।

वर्षों से चली आ रही शतपथ ब्राह्मण की यह सूक्ति यज्ञ संस्कृति का बखूबी वैशिष्ट्य दर्शाती है।

महर्षि मनु ने मनुस्मृति में सृष्टि प्रक्रिया का उल्लेख करते हुए कहा है कि अग्नि में विधि-विधानपूर्वक दी गई आहुति सूर्यदेव को प्राप्त होती है, तत्पश्चात् उससे वृष्टि होती है. वृष्टि से अन्न उत्पन्न होता है और अन्न से प्रजा की उत्पत्ति होती है-

अग्नौ प्रास्ताहुतिर्ब्रह्मात्रादित्यमुपगच्छति।

आदित्याज्जायते वृष्टिर्वृष्टेरन्नं ततः प्रजाः।।"

(मनुस्मृति –3/76)

 *मनुस्मृति और याज्ञवल्क्यस्मृति के अनुसार ब्रह्माण्ड/सृष्टि/जगत/पृथ्वी की उत्पत्ति प्रक्रिया*


मनुस्मृति में सृष्टि की उत्पत्ति का प्रतिपादन करते हुए गया है कि सृष्टि की उत्पत्ति से पूर्व अर्थात् प्रलयावस्था में यह जगत् अन्धकार से आवृत. ज्ञानरहित, लक्षणरहित, तर्करहित, अज्ञेय तथा सोया हुआ सा पड़ा था। तब अव्यक्त रूप स्वयंभू जो तमो रूप प्रकृति का प्रेरक है. उत्पन्न करने की महान शक्ति वाला भगवान् है, समस्त संसार को प्रकट करने वाला अतीन्द्रिय सूक्ष्म रूप नित्य तत्व है, सब प्राणियों का आत्मा तथा अचिन्तनीय है वह प्रकट हुआ। फिर उस परमात्मा ने सदसदात्मकप्रकृति से महत् को, महत्तत्त्व से अभिमानात्मक और सामर्थ्यशाली अहंकार को, फिर उससे सब त्रिगुणात्मकपदार्थों को, आत्मोपकारक मन को, विषयों को ग्रहण करने वाली इन्द्रियों को उत्पन्न किया। तत्पश्चात अत्याधिक शक्तिशाली छह अवयवों अर्थात् अहंकार तथा पाँच तन्मात्राओं से पंचमहाभूतों की उत्पत्ति की।

(मनुस्मृति- 1/14-6)

इन तथा उनके कार्यों को परमात्मा का शरीर कहा गया है।

"वन्मृत्येवययाः सूक्ष्मास्तस्येमान्याश्रयन्ति षट्। तस्माच्छरीर मित्याहुस्तस्य मूर्ति मनीषिणःll ( मनुस्मृति- 1/14)

उस परमात्मा ने अपने शरीर से अनेक प्रकार की प्रजाओं की सृष्टि करने की इच्छा से ध्यान करके पहले अप तत्त्व की उत्पत्ति की फिर अप तत्त्व में शक्ति रूपी बीज छोड़ा। वह बीज हजारों सूर्यो की ज्योति के समान सुनहरे अच्छे में परिणत हो गया। तत्पश्चात समस्त लोकों वो पितामह ब्रह्मा उससे अपने आप उत्पन्न हुए।

सोभिध्याय शरीरात्स्वात्सिमृक्षुर्विविधाः प्रजाः।

अप एव ससर्जाडिडदौ तासु बीजमवासृजत्।।

तदण्डमभवद् हेमं सहस्राशंसमप्रभम्। तस्मिंयज्ञे स्वयं ब्रह्मा सर्वलोक पितामहः।। (मनुस्मृति-1/ 8-9)

 तत्पश्चात ब्लॉक और पृथ्वी लोक समस्त दिशाएं समुद्र आदि उत्पन्न हुये।"


"तस्मिन्नण्ठे स भगवानुषित्त्वा परिवत्सरम्।

स्वयमेवोत्मनो ध्यानात्तदण्ठमकरोदद्विधा ।।

ताभ्यां स शकलाभ्यां च दिवं भूमि च निर्ममे।

मध्ये व्योम दिशाचाष्टावपां स्थानं व शाश्वतम्।। (मनुस्मृति-1/12-13)

 उसके पश्चात उन्होंने समस्त पदार्थों के नाम, भिन्न-भिन्न कर्म, वर्षों के विभाग किये।

सर्वेषां तु स नामानि कर्माणि च पृथक् पृथक्।

वेदशब्देभ्य एवोदौ पृथक्संस्थाशय निर्ममे।। (मनुस्मृति-1 / 21)

तत्पश्चात अग्नि आदि से चारों वेदों की उत्पत्ति हुई समय आदि के विभाग के साथ नक्षत्र ग्रह सरिता एवं अन्य तत्व उत्पन्न हुए और इस प्रकार सारी सृष्टि को रचा।


याज्ञवल्क्य स्मृति में निरूपित सृष्टि का मूल आत्मा को कहा गया है।

निःसरन्ति यथा लोहपिण्डात्तप्तात्स्फुलिंगकाः।

सकाशादात्मनस्तद्वदात्मानः प्रभवन्ति हि ।। 

(याज्ञवत्वय रमृति-3/4/67)


वह निमित्त, अक्षर, कर्ता, बोद्धा, ब्रह्म, गुणी, स्वतन्त्र, अजन्मा होने पर भी शरीर ग्रहण करने से जन्मा है।

निमित्तमक्षरः कर्ता बोद्धा ब्रह्म गुणी यशी।

अजः शरीर ग्रहणात्स जात इति कीर्त्यते ।।

(याज्ञवल्क्य स्मृति-3/4/60)

टीकाकार विज्ञानेश्वर ने उसे वास्तव में निर्गुण किन्तु अविद्या या प्रकृति रूपी शक्ति से युक्त होने पर त्रिगुणात्मक तथा सम्पूर्ण जगत् या प्रपंच के आविर्भाव के लिए अविद्या के समावेश के वश में समवायि, असमवायि और निमित्त कारण कहा है ।"

"सत्यमात्मा सकलजगत्प्रपंचाविर्भावेविद्यासमावेशवशात्समवाय्य

समवायिनिमित्तमित्येवं स्वयमेय त्रिविधमपि कारण, न पुनः कार्यकोयिनिविष्टः ।

नचासौ निर्गुणः। यस्तस्य त्रिगुणाक्तिरविद्या प्रकृतिप्रधानद्य परपर्याया विद्यते।

अतः स्वतो निर्गुणत्प्रेपिशक्तिमुखेन सत्वादि गुणयोगी कथ्यते।।

(याज्ञवल्क्य स्मृति-मिताक्षरा व्याख्या)

परन्तु अन्यत्र स्मृतिकार ने जगत् के कारण के रूप में उसका वर्णन करते हुए कहा है कि जिस प्रकार कुम्भकार दण्ड, चक्र और मिट्टी के संयोग से घट बनाता है। गृहकारक तिनके, मिट्टी और काष्ठ से घर को बनाता है। हेमकारक स्वर्ण मात्र से अनेक आभूषण बनाता है तथा जिस प्रकार मकड़ी अपनी ही लार से जाला बुनती है उसी प्रकार आत्मा भी ओत्र आदि इन्द्रियों को लेकर पृथिवी आदि साधनों से स्वयं इस संसार में विभिन्न योनियों में अपने ही शरीर की रचना करता है। इस प्रकार कुम्भ के प्रति कुम्हार के. गृह के प्रति गृहकार के तथा स्वर्ण के प्रति स्वर्णकार के उदाहरण की तुलना से वह निमित्त कारण प्रतीत होता है। परन्तु जाले के प्रति मकड़ी के उदाहरण से उसकी तुलना करने पर वह निमित्त असमवायि और उपादान कारण प्रतीत होता है। वह अनादि, आदिमान्, परमुपुरुष, सद्, असद्, सदसद् रूप है।

अनादिरादिमॉश्चौव स एवं पुरुषः परः।

लिंगेन्द्रियग्राहारूपः सविकार उदाहृतः ।।

(याज्ञवल्क्य स्मृति-3/4/183)

वह एक होते हुए भी अज्ञानवश अनेक प्रतीत होता है।


आकाशमेक हि यथा घटादिषु पृथग्भवेत्।

तथात्मैको हानेकथ्य जलाधारेष्धिवांशुमान्।। (याज्ञवल्क्य स्मृति-3/4/144)


श्रीमद्भगवद्‌गीता में तो श्री कृष्ण को ही जगत् का मूल कारण कहा गया है। वह जगत् के पिता, माता, घाता, जानने योग्य, पवित्र, ओंकार, ऋक्, यजुः, सा, गति, भर्ता प्रभु, साक्षी, निवास, शरण, सुहृत, उत्पत्ति- विनाश का स्थान, कोष, उत्पत्ति का कारण, परम ब्रह्म तथा परम आश्रय हैं।


परं ब्रह्म परं धाम पवित्रं परमं भवान,

पुरुष शाश्वत दिव्यमादिदेवमज विभुम्। (श्रीमद्भगवद्‌गीता 10.12)

कथं विद्यामहं योगिस्त्वां सदा परिचिन्तयन, केषु केषु च भावेषु चिन्त्योऽसि भगवन्मया।

विस्तरेण्यऽत्मनो योग विभूतिं च जनार्दन, भूयः कथय तृप्तिर्हि शृण्वतो नास्ति मेऽमृतम्।

(श्री मद्भगवद्‌गीता– 17-18)

निष्कर्षतः ब्रह्म ही जगत् का निमित्त तथा उपादान दोनों कारण है। अतएव संपूर्ण जगत उसका कार्य है तथा स्वयं परब्रह्म परमात्मा इस सृष्टि का कारण।